फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ये शायर बातों में भूल गए दिन व रात का फर्क, जानें - पूरा माजरा

Tue, 18 Jun 2019 04:49 PM IST
ishwar ashish अखिलेश बाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
अली सरदार जाफरी
विज्ञापन

शायर अली सरदार जाफरी, सिब्ते हसन और शायर असरारुल हसन ‘मजाज’ लखनऊ में रहते थे। आजादी का आंदोलन शबाब पर था। सरदार भी उसमें शामिल थे। तीनों पाक्षिक पत्रिका ‘नया अदब’ व साप्ताहिक अखबार ‘परचम’ निकालते थे।

विज्ञापन


लिखाई, छपाई का बंदोबस्त, कागज के इंतजाम की जिम्मेदारी सरदार पर थी। इसी सिलसिले में एक दिन दोपहर बाद तीनों लोग फरंगी महल जाने के लिए घर से निकले। तय किया, घर से अमीनाबाद तक पैदल, फिर वहां से एक-एक आना में इक्का कर लेंगे।

अमीनाबाद पहुंचे तो सामने पड़ गए सिद्दीकी बुक डिपो के मालिक मलिक मुहम्मद सिद्दीकी। सिद्दीकी साहब काफी मजाकिया व बैठकी के शौकीन थे। क्या मजाल कि उनका कोई परिचित अमीनाबाद से उनसे मिले बिना निकल जाए। दुकान भी ऐसी जगह थी, जहां से पूरा चौराहा दिखता था। सिब्ते हसन ने संस्मरण लिखा है, ‘हम लोगों को देखा तो आवाज देकर रोक लिया। दुकान के सामने पार्क में लगी बेंच पर हम जाकर बैठ गए और बातें शुरू हो गईं।

विज्ञापन
विज्ञापन

बातचीत में दो घंटे से ऊपर गुजर गया

अली सरदार जाफरी
किसी मुद्दे पर बातचीत इतनी आगे बढ़ी कि दो घंटे से ऊपर गुजर गया। सरदार और सिद्दीकी बातों में जबरदस्त तरीके से मशगूल। मजाज ने हमको उठने का इशारा किया। हम दोनों चुपके से पार्क से बाहर आए और इक्का में बैठकर फरंगी महल चल दिए।वहां फरहत उल्ला अंसारी से बातचीत हुई। खाया-पीया गया।

रात नौ बजे वापसी की। रात लगभग 10 बजे सिद्दीकी बुक डिपो पहुंचे तो देखा कि पार्क में बेंच पर सरदार और सिद्दीकी साहब के बीच बहस जारी है। सरदार ने हमको देखा तो बस इतना पूछा, ‘तुम लोग कहां चले गए थे?’ मजाज ने मासूमियत से बोला, ‘ कहीं नहीं जरा पान खाने।’ सरदार बोले, ‘कोई बात नहीं।’ दोनों फिर बातों में मशगूल हो गए।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें