शायर अली सरदार जाफरी, सिब्ते हसन और शायर असरारुल हसन ‘मजाज’ लखनऊ में रहते थे। आजादी का आंदोलन शबाब पर था। सरदार भी उसमें शामिल थे। तीनों पाक्षिक पत्रिका ‘नया अदब’ व साप्ताहिक अखबार ‘परचम’ निकालते थे।
लिखाई, छपाई का बंदोबस्त, कागज के इंतजाम की जिम्मेदारी सरदार पर थी। इसी सिलसिले में एक दिन दोपहर बाद तीनों लोग फरंगी महल जाने के लिए घर से निकले। तय किया, घर से अमीनाबाद तक पैदल, फिर वहां से एक-एक आना में इक्का कर लेंगे।
अमीनाबाद पहुंचे तो सामने पड़ गए सिद्दीकी बुक डिपो के मालिक मलिक मुहम्मद सिद्दीकी। सिद्दीकी साहब काफी मजाकिया व बैठकी के शौकीन थे। क्या मजाल कि उनका कोई परिचित अमीनाबाद से उनसे मिले बिना निकल जाए। दुकान भी ऐसी जगह थी, जहां से पूरा चौराहा दिखता था। सिब्ते हसन ने संस्मरण लिखा है, ‘हम लोगों को देखा तो आवाज देकर रोक लिया। दुकान के सामने पार्क में लगी बेंच पर हम जाकर बैठ गए और बातें शुरू हो गईं।