गजल और उर्दू शायरी के बादशाह कैफ भोपाली का लखनऊ से काफी करीबी रिश्ता था। वह जब भी लखनऊ आते तो प्रदेश में कई बार मंत्री और विधायक रहे शायर मिजाज कमाल यूसूफ मलिक के घर ही रहा करते थे। मलिक 1977 का उनका एक किस्सा बताते हैं, कैफ साहब जब भी लखनऊ आते तो उनका ज्यादातर समय घूमने में ही बीतता।
जनाब को ख्याल ही नहीं था कि जेब में पैसे नहीं है। तुंरत पहुंचे और उसका कुर्ता फाड़ दिया और पहुंच गए कपड़े की दुकान पर उसे नया कुर्ता पाजामा दिलाने। कपड़ा तो दिला दिया, लेकिन जब जेब में हाथ डाला तो वह खाली।
अब क्या करें। दुकानदार उन्हें पहचानता था कहा, ' आप जाइए, पैसे बाद में आ जाएंगे'। पर कैफ ने कहा, 'नहीं , यह उसूलों के खिलाफ है। किसी को हमारे साथ भेजिए । वह दुकान के एक व्यक्ति को रिक्शे पर बैठाकर घर आए। मुझसे पैसे लिए और उसे देकर वापस भेजा। रिक्शे वाले को भी किराये के अलावा 10 रुपये देकर कहा, 'माफ करना भाई! तुम्हारा काफी समय बरबाद हो गया।'