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पौधों को बेटी की तरह पालते हैं आचार्य, इसके लिए छोड़ दी सरकारी नौकरी

Sat, 08 Sep 2018 03:12 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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आचार्च चंद्रभूषण तिवारी - फोटो : अमर उजाला
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पर्यावरण प्रेमी चंद्रभूषण पौधों को ही अपनी बेटी मानते हैं। उनकी वृद्धि और देखभाल ही इनका जुनून बन चुका है। इसी जुनून के चलते केंद्रीय विद्यालय मेंं शिक्षक की नौकरी छोड़ कर हाथ में  खुरपा थाम लिया।
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देवरिया में जन्मे और रजनीखंड में रहने वाले आचार्य साइकिल से भ्रमण करते हैं और जहां कहीं भी दम तोड़ते पौधें नजर आते हैं, उनकी सेवा में जुट जाते हैं। जगह-जगह पौधरोपण के साथ ही आचार्य लोगों को पौंधे बांटकर  उनकी देखभाल का संकल्प भी दिलाते हैं। 

आचार्य ने केंद्रीय विद्यालय की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद अध्यापन नहीं छोड़ा। शहर के विभिन्न हिस्सों में आधा दर्जन अनौपचारिक पाठशालाएं खोलीं। बंगला बाजार के सालेहनगर, आशियाना की रिक्शा कॉलोनी, औरंगाबाद रेलवे क्रॉसिंग, ट्रांसपोर्ट नगर में शहीद पथ के किनारे, शारदानगर के रजनीखंड और वृंदावन कॉलोनी में यह पाठशालाएं सार्वजनिक स्थलों पर खुलती हैं।
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इनमें बच्चों को साक्षर बनाने के साथ सहकार, सदाचार और संस्कार की पढ़ाई होती है। इनमें पढ़ने वाले बच्चों की संख्या छह सौ के करीब है। इनमें अध्यापन करने वालों का खर्च समाज की आहुतियों से चलता है।

समधी का रिश्ता समाधान की बात

- फोटो : डेमो
यह पौधा नहीं, मेरी पुत्री है। लाड़-प्यार में पली है। कोमल है, नाजुक कली है। जानवर देखते ही डर जाती है। गर्मी में इसे बहुत प्यास लगती है। दो साल पाल देंगे तो ये आपकी पीढ़ियां पालेगी। मेरी बेटी जिंदा रहती है तो फल, फूल और छाया देती है।

कभी कोई शिकायत भी नहीं करती। मर जाने के बाद चौखट पल्ला बनकर घर की रखवाली करती है। मेरी बेटी मरघट तक साथ देगी, इसे अपना लीजिए। अपने घर-आंगन में बसा लीजिए। मुझे समधी बना लीजिए। मैं आपके लाखों दुखों में साथ दूंगा। तीन लाख पुत्रियों (पेड़ों) के पिता आचार्य पौधे लेने वाले से यह अपील करते हैं।

आचार्य बताते हैं कि 26 जनवरी 2006 को ग्यारह लाख पौधे रोपने का संकल्प लिया। साइकिल पर घूमने के दौरान पौधे लगाने की मुहिम को बारह साल बीत चुके हैं। इस दौरान उन्होंने तीन लाख पौधे लगाने का पड़ाव पार कर लिया। 
 
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हरी-हरा व्रत कथा का वाचन

चंद्रभूषण तिवारी - फोटो : अमर उजाला
पेड़ों के काटने से आहत आचार्य ने हरी-हरा व्रत कथा पुस्तक लिखी। इतना ही नहीं सत्यनारायण व्रत कथा की तरह वो घर-घर जाकर हरी-हरा व्रत कथा का वाचन करते हैं। इसके जरिए वो लोगों को पेड़ों के आध्यात्मिक महिमा से परिचित कराते हैं।

पेड़ों के अलग-अलग अंगों में देवताओं का वास है, इस मान्यता को भी समझाते हैं। आचार्य का पर्यावरण के प्रति जुनून के कई सोपान हैं। उन्होंने पौधों की महिमा का बखान करते सैकड़ों की संख्या में गीत लिखे हैं।

उनके कई गीतों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। उन्होंने लघु पुस्तिकाओं के जरिए पर्यावरण गीतों का संग्रह प्रकाशित कर वितरण भी करते हैं।
आचार्य चंद्रभूषण को तत्कालीन राज्यपाल ने बीएल जोशी ने राजभवन बुलाकर न सिर्फ सम्मानित किया था, बल्कि अभियान के लिए आर्थिक सहयोग भी किया था।

इसके अलावा प्रदेश की दर्जनों प्रतिष्ठित संस्थाओं की ओर से उन्हें सम्मान से नवाजा जा चुका है। पर्यावरण के क्षेत्र में उनको अब तक दो दर्जन से अधिक सम्मान मिल चुके हैं।
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