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नखलऊवा पंच: अंग्रेजों के लिए आफत बन गई थी 'जन्मभूमि' की आवाज, मुखबिरी ने कर दिया खामोश

Tue, 21 May 2019 05:10 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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लखनऊ क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा। महात्मा गांधी के आह्वान पर 9 अगस्त, 1942 को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ों’ आंदोलन शुरू हुआ तो लखनऊ में भी हर तरफ इसका असर दिखाई दिया। तमाम लोगों पर मुकदमे थोपे गए। नवयुवकों को तीन-तीन महीने हवालात में रखा गया। फिर मुकदमा चलाकर लखनऊ के तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट ने तीन-तीन साल की सजाएं ठोक दीं।

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मुकदमा उन दुकानदारों पर भी कर दिया गया, जिन्होंने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान अपनी दुकानें बंद कर हड़ताल को सफल बनाया। आलमनगर स्टेशन फूंकने के आरोप में रजनीकांत मिश्र, हरिकृष्ण अवस्थी, किशोरी लाल अग्रवाल, आनंद नारायण, कृष्ण स्वरूप, रामकृष्ण सिन्हा, बृजलाल शर्मा सहित कई विद्यार्थियों को पकड़कर मार-मार कर अधमरा कर दिया गया और फिर इन्हें जेल भेज दिया गया।

अंग्रेजों के समय गुप्तचर विभाग में काम करने वाले धर्मेन्द्र गौड़ ने संस्मरण में लिखा है, ‘लखनऊ से निकलने वाला ‘जन्मभूमि’ पाक्षिक अखबार अंग्रेजों की इस सारी कारगुजारी के खिलाफ आग उगल रहा था। अंग्रेजी हुकूमत लगातार कोशिश कर रही थी कि इस अखबार को लोगों तक पहुंचने से रोका जाए। पर, पता ही नहीं लगा पा रही थी।

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...और इस तहर मुखबिरी से अंग्रेजों ने ढूंढ निकाला

अखबार का प्रकाशन कर रहे थे यहियागंज मोहल्ले के रामकिशोर रस्तोगी और बरेली निवासी बृजगोपाल शर्मा। छह महीनों तक ब्रिटिश गुप्तचर अखबार और छापने वालों का पता नहीं लगा सके। पर, 7 फरवरी, 1943 को इसके एक कंपोजीटर ने अंग्रेजों से मुखबिरी कर दी।

अंग्रेजों ने छापा मारकर 2000 प्रतियां, हैंडप्रेस जब्त कर रस्तोगी व शर्मा को गिरफ्तार कर लिया। इस मुखबिर की गद्दारी ने लखनऊ से अंग्रेजों के खिलाफ गूंजने वाली ‘जन्मभूमि’ की आवाज को दबा दिया।
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