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यादें: मंगलवार को प्रसाद न पहुंचे तो आ जाता था हाशिम का संदेश

Thu, 21 Jul 2016 02:53 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, अयोध्या
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महंत ज्ञानदास के साथ हाशिम अंसारी - फोटो : amar ujala
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एक जिंदादिल इंसान, सौहार्द्र प्रेमी और अपनी बातों पर अटल रहने वाली शख्सियत थे बाबरी मस्जिद के मुद्दई मो. हाशिम अंसारी। जिस मंगलवार को प्रसाद उनके घर नहीं पहुंचता, तो संदेशा आ जाता था। कोई दिन नहीं बीतता जब हाल-चाल न लेते रहे हों।
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अयोध्या में हनुमानगढ़ी में रहते हुए मो. हाशिम अंसारी से पहचान लंबे समय से रही। वर्ष 2004 में मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या के मुस्लिम समाज में व्याप्त भय को दूर करने के लिए वे हनुमानगढ़ी के संतों के साथ निकले थे। उस दौरान हाशिम से जब हमारी मुलाकात हुई तो मंदिर मसले पर चर्चा होना एक आम बात थी।

30 सितंबर 2010 में हाईकोर्ट लखनऊ से जब विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला आया तो हाशिम अंसारी शांतिदूत के रूप में उभरे। सुलह समझौते के मकसद को लेकर हम दोनों ने प्रयास शुरू किया। लगभग छह वर्षों के सौहार्द्र मुहिम में उनके साथ बिताए गए हर पल यादगार हैं।
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हाशिम हर पल विवाद के हल को लेकर चिंता जताते रहते थे। कहते थे कि उनके जीवित रहते यह विवाद हल हो जाए तो अच्छा रहे।
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मंदिर व मस्जिद मुद्दे पर हिंदू-मुस्लिम दोनों की खुशी चाहते थे

हाशिम अंसारी - फोटो : amar ujala
वे मंदिर व मस्जिद, दोनों का निर्माण चाहते थे लेकिन निर्माण ऐसा हो, जिससे हिंदू व मुस्लिम दोनों की खुशी शामिल हो। हल की कोशिशों का ही परिणाम था कि श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े पक्षकारों निर्मोही अखाड़ा, हिंदू महासभा सहित अन्य के साथ हनुमानगढ़ी में बैठकें भी हुईं।

उनसे होने वाली हर मुलाकात विवाद के हल की हर संभव कोशिशों की तलाश को लेकर ही रहती थी। एक समय तो विवाद के सुलह-समझौते से हल का रास्ता निकलता दिखा, हस्ताक्षर भी हो गए थे, लेकिन बीच में ही ब्रेक लग गया।

मो. हाशिम व उनके परिवार से रिश्ते इतने प्रगाढ़ हो गए थे कि वे हर आठवें दिन खुद मिलने हनुमानगढ़ी आ जाते थे। पैर से लाचार होने के बाद बीमार हुए तो वे आने में असमर्थ हो गए, लेकिन फोन पर हालचाल लेते और सुलह की कोशिशों के बारे में बात किया करते थे।

हाशिम जी के व्यवहार से कभी यह नहीं लगा कि वे दूसरी जाति, धर्म संप्रदाय के हैं। उनसे एक बड़े भाई का पूरा प्यार मिलता था। समाज को हाशिम से बहुत आशाएं थीं। उनके निधन से पूरे भारत को क्षति हुई है। अब ऐसा बेबाक इंसान मिल पाना बहुत मुश्किल है।

अपने बयानों से वह अपने मुस्लिम नेताओं के निशाने पर रहे। माली हालत ठीक न हो पाने पर भी अपने ईमान से कभी नहीं डिगे। उनकी अंतिम दिनों तक इच्छा रही कि सुलह का रास्ता किसी तरह से निकले। (जैसा हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास ने कहा।)
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