शासन के एक आला अफसर को एकाएक भूलने की बीमारी लग गई है।
जब उनके पास उद्योग-धंधे वाला महकमा था तो काफी मीडिया फ्रेंडली थे और लोगों से मिलते जुलते भी खूब थे लेकिन जब से ‘करंट’ वाले महकमे में आए हैं झटका मारने लगे हैं।
उन्हें भूलने की बीमारी सी लग गई है। बापू भवन से लेकर शक्ति भवन तक निगाह रखना वैसे भी आसान काम नहीं। बापू भवन में मिलने वालों के लिए उन्होंने नायाब इंतजाम किया है।
मिलने वालों के लिए अपने कमरे के ठीक बगल में ‘वेटिंग रूम’ बनवा रखा है।‘वेटिंग रूम’ भी ऐसा कि कोई ज्यादा देर बैठे तो दम घुटने लगे।
ऐसे में लोग थोड़ी देर इंतजार करके लौट जाना ही बेहतर समझते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो धैर्य रखते हुए एक-डेढ़ घंटे तक मिलने का इंतजार भी करते हैं लेकिन ऐसे लोगों को तब झटका लगता है जब पता चलता है कि साहब निकल गए।
शिकवा-शिकायत का भी कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि स्टाफ बड़ी मायूसी से जवाब देता है कि साहब भूल गए होंगे। मिलने वाले समझ नहीं पाते कि क्या वास्तव में साहब को भूलने की बीमारी है।