पता नहीं यह संयोग है या विरोधियों की चाल कि सियासी अखाड़े में बड़े-बड़े पहलवानों पर धोबीपाट लगाने वाले ‘नेताजी’ को आजकल अपने दांव पर ही घेरा जा रहा है।
साइकिल की सवारी करने वाले कहते हैं, वे मुंह भी खोलते हैं तो चर्चाएं शुरू हो जाती हैं और दूसरे गरजें तो भी शोर नहीं होता।
दंगा पीड़ितों के कैंपों के पीछे भाजपा और कांग्रेस के षड्यंत्रकारियों का जिक्र क्या किया, मीडिया और विरोधियों ने इसे ऐसा उड़ाया कि बात का बतंगड़ बन गया।
मोदी की वजह से भाजपा को कुछ फायदा होने की बात क्या कह दी, इसके मतलब निकाले जाने लगे। पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार प्रोजेक्ट किया तो कुछ नहीं, वह कार्यकर्ताओं में इसे जाहिर कर दें तो तूफान।
गांव के महोत्सव में हर साल जाते हैं। इस बार गए तो टीवी चैनलों ने वहां के रंगारंग उत्सव और दंगा पीड़ितों के कैंपों की बदहाली की फुटेज साथ-साथ चला दी।
हवा में उड़ने वाले एक नेता ने तो मुजफ्फरनगर दंगे पर यहां तक कह दिया- ‘पहलवान ने दांव हम पर लगाया था, चित खुद हो गया’।
इन सभी को कौन बताए, अपने नेताजी को पुराना तजुर्बा है, मंझे हुए पहलवान की तरह आखिरी क्षण में बाजी पलटने की कला जो उन्हें आती है।