निकायों से जुड़े विभाग के मुखिया खां साहब और एक विशेष सचिव की जुगलबंदी से हर कोई वाकिफ है।
यह जुगलबंदी विभाग ही नहीं, प्रदेश भर में चर्चा का विषय है। कहते हैं कि दोनों एक-दूसरे को इतने अच्छी तरीके से समझते हैं कि इशारों-इशारों में ही सब-कुछ हो जाता है।
हाल ही में निकाय अध्यक्षों का सम्मेलन था। सम्मेलन में सब कुछ विशेष वाले सचिव ने ही संभाला। एक दिन बाद वह कुछ लोगों के साथ बैठे थे। चर्चा उनके और खां साहब के रिश्तों की चली।
इस दौरान, विशेष सचिव साहब ने उर्दू के कुछ शब्दों का इस्तेमाल किया। सामने बैठने वाला बोल पड़ा, साहब उर्दू सीख रहे हैं क्या? जवाब आया-अरे नहीं भाई, अब तो आदत ही सलाम करने की हो गई है।
इस पर उन्होंने एक राज्य मंत्री के फोन का एक वाकया सुनाया। बताया, राज्यमंत्री का फोन आने पर मैंने उन्हें सलाम किया, तो उनका जवाब भी कुछ ऐसे ही आया।
फिर राज्यमंत्री ने चुटकी लेते हुए पूछा, क्या अब नमस्ते की जगह सभी को सलाम करते हैं? जवाब था, सलाम के बिना काम चलने वाला भी नहीं।