मुखिया विहीन डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की इमरजेंसी में चिकित्सा व्यवस्था पटरी से उतर गई है। सबसे ज्यादा फजीहत यहां रात में पहुंचने वाले मरीजों की हो रही है। गेट पर सक्रिय दलाल पहले तो बाहर से ही बेड न होने की बात कह मरीजों को निजी अस्पताल चलने के लिए रिझाते हैं।
यदि मरीज जिद करके इमरजेंसी तक पहुंच भी गए तो वहां तमाम समस्याओं से जूझना पड़ता है। रात में इमरजेंसी का ये हाल है कि मोबाइल टॉर्च की रोशनी में टांके लगाए जाते हैं। इस अव्यवस्था से डॉक्टर भी परेशान हैं और मरीजों को लौटाने के पीछे इस मजबूरी का भी हवाला देते हैं। पेश है यहां के हालात बयां करती शनिवार रात की लाइव रिपोर्ट...।
यहां तो कोविड-19 की जांच में ही दो दिन लग जाएंगे...
शनिवार रात करीब 10:00 बजे संस्थान के हॉस्पिटल ब्लॉक के गेट पर मरीज के पहुंचते ही कुछ लोग उसे घेर लेते हैं। वे संस्थान की इमरजेंसी में बेड फुल होने की बात कह पास के दो निजी अस्पतालों का पता बताते हैं। यह भी कहते हैं कि डॉक्टर ने भर्ती कर भी लिया तो यहां कोविड-19 की जांच होने में दो दिन लग जाएंगे और तब तक मरीज की मौत हो जाएगी। गेट से अंदर जाने पर सुरक्षाकर्मी व कुछ चिकित्सा कर्मी मिलते हैं तो वे भी इमरजेंसी में बेड नहीं होने की बात कहकर निजी अस्पताल जाने को कहते हैं।
तीमारदार बनकर मरीजों को बरगला रहे दलाल
इमरजेंसी के गेट पर पहुंचने के बाद शुरू होती है स्ट्रेचर की खोज। करीब 10 मिनट बाद स्ट्रेचर मिलता है। इस दौरान मरीज को कराहते देख कुछ दलाल खुद को तीमारदार बताकर उसे बरगलाते हैं। बताते हैं कि इमरजेंसी में उनका मरीज दोपहर से पड़ा है और अभी तक इलाज शुरू नहीं हुआ है। घर वालों को निजी अस्पताल जाने की सलाह देते हैं।
बेड तो नहीं खाली है, जहां जगह हो लिटा दो मरीज
स्ट्रेचर सेल से मरीज को लेकर तीमारदार इमरजेंसी में पहुंचते हैं तो वहां सीनियर डॉक्टर मोबाइल पर गेम खेलते मिलते हैं। जूनियर डॉक्टर मरीजों के इलाज में लगे हैं। इन डॉक्टरों का कहना होता है कि बेड तो नहीं खाली है, जहां जगह हो मरीज को लिटा दो।
बेड बढ़े, पर नहीं बनी बात
लोहिया संस्थान में कुल 1017 बेड हैं। इसमें हॉस्पिटल ब्लॉक में 467, सुपर स्पेशिएलिटी में 350 व शहीद पथ स्थित केंद्र में 200 बेड हैं। मातृ शिशु केंद्र को कोविड हॉस्पिटल बनाया है। संस्थान की इमरजेंसी में 44 बेड थे, जिन्हें बढ़ाकर 80 करने का दावा किया गया था। यहां रोज करीब डेढ़ सौ मरीज आते हैं। इसमें आधे को भर्ती करते हैं। रात में ज्यादातर को बेड नहीं होने की बात कह लौटा देते हैं।
टांका लगाने चले तो बत्ती गुल
रात के करीब 10:30 बज चुके थे। काफी जद्दोजहद के बाद दुर्घटना में घायल मरीज के पास डॉक्टर और दो कर्मचारी पहुंचते हैं। डॉक्टर मरीज को देखते हैं और कर्मचारियों को टांका लगाने को कहते हैं। जैसे ही टांके लगने शुरू होते हैं लाइट चली जाती है। पांच मिनट इंतजार के बाद कर्मचारी मोबाइल की टॉर्च जलाने का इशारा करता है। तीमारदार मोबाइल टॉर्च ऑन करते हैं और फिर टांके लगते हैं। तीमारदारों ने बताया कि बिजली जाने पर जनरेटर नहीं चलता। डॉक्टर भी कहते हैं कि यहां की व्यवस्था देखने से किसी को मतलब नहीं है, सब सिर्फ हुक्म चलाते हैं।
निदेशक की कुर्सी खाली
संस्थान के निदेशक के जाने के बाद यहां की जिम्मेदारी कार्यवाहक निदेशक को सौंपी गई। कुछ दिन पहले उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया है। वहीं संस्थान के नए कार्यवाहक निदेशक ने अभी तक चार्ज नहीं लिया है। ऐसे में यहां की व्यवस्था पटरी से उतरी है।
पूरा अस्पताल बैकअप से लैस है। जनरेटर भी है। कई बार जनरेटर चलाने में 5 से 10 मिनट का टाइम लग जाता है। शनिवार रात इमरजेंसी में हुई अव्यवस्था की पड़ताल कराई जाएगी। गेट से दलालों को खदेड़ने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे। - डॉ. श्रीकेश सिंह,मीडिया प्रभारी लोहिया संस्थान।