लखनऊ। गर्भावस्था के नौ महीने पूरे होने के बाद भी प्रसव पीड़ा शुरू होने का इंतजार करना मां और बच्चे की जान जोखिम में डाल सकता है। नियमित जांच न कराने और चिकित्सकीय सलाह की अनदेखी से गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में समय पर अस्पताल पहुंचना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार निर्णय लेना जरूरी है।
निधि (बदला हुआ नाम) नौ महीने पूरे होने के बाद भी प्रसव पीड़ा का इंतजार करती रहीं। करीब 10 दिन बाद अस्पताल पहुंचने पर जांच में गर्भाशय में पानी काफी कम मिला और बच्चे ने गर्भ में ही मल त्याग कर दिया था। चिकित्सकों ने प्रयास कर सुरक्षित प्रसव कराया। मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहे।
सीएचसी सिल्वर जुबली की अधीक्षक डॉ. प्रियंका के मुताबिक, कई गर्भवती महिलाएं पहली जांच के बाद दो से चार महीने तक अस्पताल नहीं आतीं। परेशानी महसूस न होने पर वे नियमित जांच को जरूरी नहीं समझतीं। प्रसव के समय सिजेरियन की सलाह मानने में देरी भी जोखिम बढ़ा सकती है। उन्होंने बताया कि केंद्र पर हर महीने औसतन 90 प्रसव होते हैं, जिनमें करीब 60 सामान्य और 30 सिजेरियन होते हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एनबी सिंह ने गर्भवती महिलाओं और परिजनों से नियमित जांच कराने और डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय पर अस्पताल पहुंचने की सलाह दी।
जिले में छह महीने में हुए 38,727 प्रसव
जिला स्वास्थ्य शिक्षा एवं सूचना अधिकारी योगेश रघुवंशी के अनुसार, एक अप्रैल से 30 सितंबर तक जिले की 27 प्रथम संदर्भन इकाइयों (एफआरयू) सहित केजीएमयू, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल और वीरांगना अवंतीबाई जिला महिला अस्पताल समेत स्वास्थ्य संस्थानों में कुल 38,727 प्रसव हुए। इनमें 17,420 सामान्य और 21,307 सिजेरियन प्रसव शामिल हैं।