दावा तो 2017 के चुनाव की चुनौतियों से निपटने के उपाय तलाशने का था लेकिन भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की गाजियाबाद बैठक सिर्फ कर्मकांड बनकर रह गई। अमूमन ऐसी बैठकों में रखे जाने वाले राजनीतिक व कृषि (आर्थिक) प्रस्ताव पार्टी की भविष्य की रणनीति का संकेत देने वाले होते हैं।
पर, गाजियाबाद में रखे गए दोनों प्रस्ताव पार्टी नेताओं के रोजमर्रा के बयानों का संकलन जैसे नजर आए। इसके अलावा अगर कुछ रहा तो वह मोदी सरकार की उपलब्धियों का बखान।
पार्टी के प्रस्तावों में बसपा व कांग्रेस का एक-दो जगह जिक्र तो हुआ लेकिन हमला बोलने पर चुप्पी ही दिखी। भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ठोस बात भी नहीं कही गई।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का अध्यक्षीय उद्बोधन, भाषण कम महासंपर्क अभियान के दौरान लोगों को बताई जाने वाली उपलब्धियों की किताब जैसा ज्यादा लगा। नेताओं के भाषण हुए और बाकी समय नसीहतों में बीता।
प्रदेश सरकार की खामियां तो खूब बताई गईं लेकिन भाजपा इसके खिलाफ करेगी क्या, इस पर मौन ही साधे रखा गया। यह शायद पहली प्रदेश कार्यसमिति की बैठक होगी, जो बिना किसी कार्ययोजना या आंदोलन का फैसला किए समाप्त हो गई।
चर्चा भी हुई तो महासंपर्क अभियान जैसे उस मुद्दे की जिसके बारे में पहले ही कई बैठकें हो चुकी हैं। दरअसल, चर्चा का सत्र हुआ ही नहीं।
लगातार मिल रही है हार
वैसे तो अभी एक महीना भी नहीं बीता जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी और महामंत्री संगठन सुनील बंसल को सभी को साथ लेकर चलने की नसीहत दी थी।
मगर कार्यसमिति बैठक से जिस तरह पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह, सूर्यप्रताप शाही व विनय कटियार सहित कई नेताओं ने दूरी बनाई उससे फिर यह साफ हो गया कि भले ही लोकसभा चुनाव में भाजपा को इस प्रदेश में 80 में 73 सीटें मिल गई हों लेकिन पार्टी को खींचतान व गुटबाजी जैसे रोगों से मुक्ति नहीं मिली है।
मौजूदा नेतृत्व का पुराने नेताओं से संवाद, संपर्क या समन्वय नहीं है। प्रदेश प्रभारी ओम माथुर ने कहा भी, ‘मानना चाहिए कि संवाद खत्म हो रहा है। अगर सब कुछ अच्छा ही अच्छा हो रहा है तो नतीजे अच्छे क्यों नहीं आ रहे? उप चुनाव हार रहे हैं। लगता है, लोकसभा चुनाव के बाद कुछ न कुछ गड़बड़ है।’
जो थे उन्हें भी बोलने का मौका नहीं
जो नेता गए नहीं उनकी बात तो दूर, जो पहुंचे उन्हें भी बोलने का मौका नहीं दिया गया। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी मौजूद थे लेकिन दोनों दिन श्रोता ही रहे। हद तो यह कि बैठक में विधानमंडल के दोनों सदनों के नेता हृदयनारायण दीक्षित और सुरेश खन्ना भी दर्शक दीर्घा में ही बैठे रहे।
इन्हें बोलने का मौका न मिलने से यह साबित हो गया कि पार्टी के भीतर मतभेद ही नहीं ‘मनभेद’ भी हैं।
शायद इसीलिए ओम माथुर को संकेतों में मौजूदा नेतृत्व को आगाह करना पड़ा। कहा, ‘सारा काम अपने ही हाथ में नहीं समेटना चाहिए।’ फिर इशारों में बोले, ‘वाजपेयीजी पर ज्यादा जिम्मेदारी न डालिए।’
कथनी-करनी में अंतर भी दिखा
नेताओं के भाषण में दलितों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कही गई। राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने डॉ. अंबेडकर की खूबियों का विस्तार से जिक्र किया। बैठक में मौजूद लोगों को डॉ. अंबेडकर के बारे में भाजपा संगठन और उसकी अलग-अलग सरकारों द्वारा किए गए कामों के बारे में बताया गया।
साथ ही उनसे इस बारे में आम लोगों को बताने की अपेक्षा भी की गई। पर, दो दिन की बैठक में एक भी वक्ता इस वर्ग का नहीं दिखा जबकि रमापति शास्त्री व रामनाथ कोविद वहां मौजूद थे।
पार्टी के सामने चिंता नहीं चुनौतियां हैं
कुल मिलाकर दो दिन की इस बैठक में प्रदेश भाजपा अतीत में ही गोते लगाती रही। संगठन की चिंताओं से मुक्ति का न तो कोई उपाय तलाश सकी, न ही कोई विजन दिखा।
प्रदेश अध्यक्ष वाजपेयी ही नहीं बल्कि अमित शाह व नितिन गडकरी भी 2017 की चिंता पर चुप्पी साधे रहे। इन नेताओं ने यह तो कहा कि 2017 में प्रदेश में भी भाजपा की बहुमत की सरकार बनेगी लेकिन यह होगा कैसे, इस पर वे कुछ नहीं बोले।
प्रदेश अध्यक्ष वाजपेयी से जब सूबे में पार्टी की चिंताओं के बारे में बैठक में हुए चिंतन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने भी जवाब दिया, ‘पार्टी के सामने चिंता नहीं चुनौतियां हैं।'
यह कहने पर कि उपचुनाव में लगातार हार क्या चिंता की वजह नहीं है। वाजपेयी बोले, ‘उपचुनाव की जीत-हार पैमाना नहीं होती। उपचुनाव हारने से कोई फर्क भी नहीं पड़ता।’