सियासी दलों में प्रवक्ता पद खासी अहमियत रखता है। जब पार्टी की सरकार हो तो प्रवक्ता और भी ज्यादा अहम हो जाता है।
सूबे में सत्तारूढ़ सपा के प्रवक्ता बेजोड़ हैं। जितने भरोसेमंद ‘नेताजी’ के उतने ही ‘सरकार’ के। इसलिए मंत्री भी हैं। अब हालत यह है कि ‘सरकार’ बिना उनके एक कदम चलते भी नहीं।
उनकी गिनती ‘पावरफुल’ मंत्रियों में होती है, लेकिन उनके करीबी और मित्र उनकी फितरत से परेशान हैं। पार्टी और सरकार में क्या चल रहा है उन्हें सब पता रहता है, लेकिन क्या मजाल कोई उनसे उगलवा ले।
उतना ही बोलेंगे जितना ऊपर से इशारा होगा। पिछले दिनों मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा चली तो उनके एक बेहद नजदीकी उनसे पूछ बैठे कि कौन मंत्री बन रहा है?
प्रवक्ता ऐसे चौंके जैसे करंट लग गया हो। बोले- विस्तार हो रहा है। अरे! मुझे तो पता ही नहीं। जबकि प्रवक्ता थोड़ी देर पहले वहीं से निकले थे जहां मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर बैठक हुई थी।
नजदीकी को भी पता चल गया कि प्रवक्ता महोदय कितने मंझे हुए नेता हैं। कमरे से बाहर निकलते हुए बोले, भई प्रवक्ता हो तो ऐसा।