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अखिलेश ने सोच-समझकर चला मायावती से दोस्ती का दांव, भाजपा पर दबाव

Sat, 11 Mar 2017 07:33 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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अखिलेश यादव व मायावती
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यूपी विधानसभा चुनाव नतीजों के पहले एक्जिट पोल के संकेतों ने सूबे की सियासत की गुत्थी उलझा दी है। कुछ सर्वे में भाजपा के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद त्रिशंकु की स्थिति नजर आने से असमंजस बना है।
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उस पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का आगे बढ़कर सरकार बनाने के लिए बसपा से गठबंधन का संकेत करने से सूबे की सियासत में नए समीकरण की चर्चा तेज हुई है। ऐसी कोई संभावना तभी बनेगी, जब किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिले। हालांकि विश्लेषक इस अनुमान को भाजपा विरोधी सियासत का टर्निंग पॉइंट मान रहे हैं।

वर्ष 1993 में सपा और बसपा में चुनाव पूर्व गठबंधन हुआ था। तब मुलायम सिंह यादव सपा के और कांशीराम बसपा के सर्वेसर्वा हुआ करते थे। सपा ने तब 256 और बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इन दलों ने क्रमश: 109 और 67 सीटें जीती थीं।
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मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह दोस्ती बहुत लंबी नहीं चली। वर्ष 1995 में बसपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। बाद में गेस्ट हाउस कांड में पूर्व सीएम मायावती के साथ जिस तरह दुर्व्यवहार हुआ, उससे दोनों दलों के बीच रिश्ते इस कदर खराब हुए, जो मुलायम सिंह यादव के सपा मुखिया रहते कभी सामान्य नहीं हो पाए।

इस बिगड़े रिश्ते का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि वर्ष 2007 में मायावती जब पूर्ण बहुमत की सरकार के साथ सत्ता में लौटी तो उन्होंने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ तमाम अनियमिताताओं के आरोप में ताबड़तोड़ मुकदमें दर्ज करा दिए थे, जो सपा की सरकार आने के बाद ही दाखिल-दफ्तर हो सके।

बसपा के प्रति हमेशा से ही उदार रहे हैं सीएम अखिलेश

बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : अमर उजाला
बसपा का रवैया जिस तरह सपा के प्रति था, वर्ष 2012 में सपा के सत्ता में आने के बाद सपा का रवैया बसपा के प्रति वैसा नहीं रहा। अखिलेश यादव ने उम्मीद के विपरीत बसपा के प्रति उदारता दिखाई।

अखिलेश ने बसपा शासनकाल में बने कुछ जिलों, संस्थाओं और योजनाओं के नाम तो बदले, लेकिन बसपा नेताओं के खिलाफ कोई निजी कार्रवाई नहीं की। उलटा, लोकायुक्त के स्तर पर हुई जांच में उलझे नेताओं पर कार्रवाई का मामला टालते रहे। अखिलेश ने राज्यपाल के निर्देश के बावजूद उन मामलों में दिलचस्पी नहीं दिखाई।

इसके अलावा मायावती ने भाजपा नेता रहे दयाशंकर सिंह द्वारा अपशब्द कहने पर जब बुआ के रिश्ते का जिक्र कर कार्रवाई की मांग की तो दयाशंकर को तत्काल गिरफ्तार करा दिया।

इसके अलावा अखिलेश ने आखिरी चरण की वोटिंग के पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती के आरोपों के बहाने ही सही उन्हें अपने घर पर चाय पीने के लिए आने की बात कही। यह बेशक तब कटाक्ष लगा था, लेकिन अब त्रिशंकु की स्थिति में बसपा की ओर हाथ बढ़ाने के संकेतों के बाद इसे बदले समय के रिश्ते की बानगी से जोड़ा जा रहा है।

मायावती भी अखिलेश के प्रति रहीं नरम

मायावती ने सपा पर जब कभी हमला बोला तो निशाने पर सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ही रहे। वह सपा सरकार को निशाना बनाने पर भी अखिलेश का नाम लेने से बचने का प्रयास करती रहीं।

चुनाव के दौरान अखिलेश व मायावती की जुबानी जंग पत्थर वाली सरकार व विदेशी पत्थर और बुआ व बबुआ पर केंद्रित रही।

मायावती ने कई बार अखिलेश को दागी सीएम कहा, लेकिन हमेशा कानून-व्यवस्था के मामले में कहा। कभी भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए। वह हमेशा व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचीं।

तालमेल सपा-बसपा दोनों की सियासी जरूरत

- फोटो : amar ujala
अब न तो वर्ष 1993 वाली सपा बची है और न ही बसपा। अब सपा के सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव की जगह अखिलेश यादव हैं तो बसपा की कमान मायावती के हाथ है। दोनों ही दल अगर अपने बलबूते सत्ता की दौड़ में लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते हैं तो सियासी डगर आसान नहीं रहने वाली है।

बसपा यदि इस बार भी सत्ता से बाहर रहती है तो उसकी सियासत व मूवमेंट की लड़ाई कमजोर होगी। वहीं पारिवारिक  कलह से अलग रास्ता बना रहे अखिलेश के लिए भी चुनौती आसान नहीं होगी, इसका संकेत साधना यादव के बयान से मिल चुका है।

इन परिस्थितियों में यदि भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है और सांप्रदायिक शक्ति के रूप में भाजपा को रोकने के नाम पर सपा और बसपा सरकार बनाने के लिए एक साथ आते हैं तो इसमें बड़े आश्चर्य की बात नहीं होगी।

विश्लेषक इसे सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में एक बड़ा कदम करार दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक व समाजशास्त्री आनंद कुमार इसे बिहार के चुनाव पूर्व गठबंधन की तरह यूपी में चुनाव बाद वैसे ही प्रयोग के रूप में देख रहे हैं।

...पर गठबंधन के भविष्य पर हमेशा रहेंगी आशंकाएं

सपा-कांग्रेस व बसपा का यदि गठजोड़ होता है तो उसके भविष्य पर सवाल भी हमेशा रहेंगे। इसकी मुख्य वजह ये है कि दोनों ही दलों की अपने बेस वोट के अलावा मुस्लिम वोट बैंक पर नजर है।

अपने आधार को बढ़ाने के लिए दोनों में यह कशमकश हमेशा बनी रहेगी। इसके अलावा बसपा ने कई बार गठबंधन की सरकार चलाई। पर, वह कभी भी गठबंधन की शर्तों पर कायम नहीं रहीं।

बारी-बारी की सरकार के फार्मूले में पहले मायावती मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन जब भाजपा का मौका आया तो उल्टा चाल चल दे गईं।

समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि कांशीराम कहते थे कि बाकी सभी दल दलित विरोधी हैं। ऐसे में वह ही सिद्धांत क्यों अपनाएं? उनका जो भी निर्णय होता है बहुजन समाज और मूवमेंट के हित में होता है।

एक तीर से कई निशाने साधे

- सूबे की सियासत पर गहरी नजर रख रहे एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने बिना चुनाव नतीजे आए अनायास ही बसपा से गठबंधन का संकेत नहीं किया है। यह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इससे एक तीर से कई निशाने साधे हैं।

पहला, भाजपा को सत्ता में आने से रोकना। इसलिए जरूरी है कि क्योंकि भाजपा ने उनकी सरकार की भर्तियों के साथ तमाम निर्णयों की जांच कराने का वादा किया है। यदि ऐसा होता है तो इससे मुख्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंच सकता है, जो लंबी राजनीति के लिहाज से ठीक नहीं रहेगा। सपा सरकार के समय के तमाम प्रकरणों की सीबीआई जांच हो रही रही है।

- सीएम की इस पहल में बसपा से सहयोग मिलने में ज्यादा मुश्किल नहीं आनी चाहिए। वजह, भाजपा सत्ता में न आए इसमें बसपा नेताओं के भी हित हैं। पिछले पांच साल में सीएम बसपा के पूर्व मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त जांच के मामले पर ठोस कार्रवाई करने से बचते रहे हैं। भाजपा के आने पर उस पर भी बात बढ़ सकती है।

भाजपा पर बढ़ा दिया है दबाव

- तीसरा, अखिलेश ने सबसे पहले हाथ मिलाने का संकेत कर बसपा पर भाजपा से न मिलने का दबाव बढ़ा दिया है। पूर्ण बहुमत न पाने पर भाजपा, बसपा के साथ हाथ बढ़ा सकती थी।

यदि बसपा अखिलेश के प्रस्ताव से मुकरती है और भाजपा के पाले में जाना चाहती है तो सियासी तौर पर इससे सपा को फायदा होगा। इससे मुस्लिम समाज बसपा से फिर दूर होगा और सपा का आधार मजबूत बनेगा। सीएम के संकेतों से बसपा बसपा उलझ गई है।

इस पर जेएनयू के समाजशास्‍त्री प्रो. बद्रीनारायण कहते है कि सपा-बसपा का हाथ मिलाना, भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा है। पिछड़ी व दलित की राजनीति के विकास व विस्तार के लिए अच्छा होगा। कांशीराम ने यह प्रयोग किया था, लेकिन वह फेल रहा। अखिलेश यादव व मायावती यदि अपने दायरे से बाहर आकर मिलकर सरकार बनाने के लिए आगे बढ़ते हैं तो अच्छा हो सकता है।
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स्पष्ट बहुमत न मिलना भाजपा के लिए चिंता की बात

जेएनयू के रिटायर्ड समाजशास्‍त्री प्रो. आनंद कुमार का कहना है कि इस चुनाव में भाजपा, सपा-कांग्रेस और बसपा की तिकोनी लड़ाई हुई है। इसमें भाजपा को फायदा हो सकता है, लेकिन त्रिशंकु की स्थिति आती है तो भाजपा को चिंता होनी चाहिए।

भाजपा ने इस चुनाव को जीतने के लिए जिस तरह का सांप्रदायिक माहौल बनाया और प्रधानमंत्री ने जिस हिसाब से किसी भी दल के नेता को प्रचार में नहीं छोड़ा, उन स्थितियों में सपा व बसपा का अपनी सामाजिक जमीन छोड़कर भाजपा से मिलना मुश्किल है।

इसके अलावा बिना इन दोनों के मिले भाजपा को रोकना भी मुश्किल है। ये दोनों दल यदि एक साथ आते हैं तो यह वर्ष 2019 का आधार बनेगा। अखिलेश ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जाकर बसपा की ओर हाथ बढ़ाने का संकेत कर साहस दिखाया है।

बसपा ने भी मुस्लिमों को 100 टिकट देकर जो आधार बनाया है, उसे बनाए रखने के लिए इस प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख दिखा सकती है। मायावती खुद को सीएम बनाने की शर्त रख सकती हैं, जैसा कि पहले हुआ है। यदि यह तस्वीर बनती है तो मोदी के लिए यह बिहार के घाव पर मरहम की जगह घाव ताजा होना हो जाएगा।
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