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यहां देखें, यूपी में महागठबंधन पर क्या है समीकरण

Mon, 16 Nov 2015 02:01 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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राजनीति संभावनाओं का खेल है। इसमें कोई स्थायी शत्रु या स्थायी मित्र नहीं होता। विपरीत ध्रुव समझे जाने वाले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन करके इसे साबित भी कर दिया।
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बिहार के चुनावी नतीजों के बाद यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन की आहट सुनाई देने लगी है। महागठबंधन के पक्ष, विपक्ष में नेताओं के बयान भी आने लगे हैं। वैसे भी यूपी में दलों का गठबंधन कोई नया नहीं है। पर, महागठबंधन बन पाएगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

हां, महागठबंधन के स्वरूप को लेकर अटकलें जरूर लगाई जाने लगी हैं। लालू-नीतीश की तरह बेमेल कही जाने वाली राजनीतिक संभावनाएं भी इसमें शामिल हैं। सपा के प्रमुख नेता शिवपाल यादव ने महागठबंधन की दिशा में सकारात्मक सोच की बात रखी तो अखिलेश सरकार के एक मंत्री सपा-बसपा के बीच दोस्ती की दुआ के साथ सामने आ गए।
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फिलहाल सियासी वजहों से ऐसी आवाज को महत्व मिलने की संभावनाएं तो नहीं बन रहीं, लेकिन चुनाव करीब आने और विरोधियों के पत्ते खुलने पर सियासी दल इस दिशा में आगे बढ़ते दिख सकते हैं।

वैसे भी अपने विरोधियों को पछाड़ने के लिए हर दांव आजमाना सियासत का नया अंदाज है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बिहार में तो दिखा ही और यूपी की जमीन भी उससे अलग नहीं है।

सपा-बसपा मिलकर लड़ें चुनाव

बिहार में जिस तरह लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के मिलन को कुछ लोग साल भर पहले तक असंभव मानते थे, उसी तरह सपा-बसपा का महागठबंधन होना बेमेल लगता है। यह मुश्किल जरूर है, पर असंभव नहीं। वर्ष 1993 में दोनों दलों ने गठबंधन करके न सिर्फ चुनाव लड़ा था वरन यूपी में सरकार भी बनाई थी।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि बिहार की तरह पिछड़ों, दलितों और मुस्लिमों की एकजुटता के लिए सपा-बसपा का मेल-मिलाप सबसे प्रभावी हो सकता है। भाजपा को रोकने के लिए अखिलेश सरकार के एक मंत्री भी सपा-बसपा महागठबंधन की पैरोकारी के साथ मैदान में हैं। अब देखना ये है कि इनकी आवाज को और जोर मिलता है या ऐसी संभावना को जमीन नहीं मिल पाती।

सपा-कांग्रेस-रालोद साथ आएं
एक संभावना इस बात की है कि सत्ताधारी समाजवादी पार्टी 2017 में कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियों से गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरे। इसमें लालू और नीतीश समेत दूसरे सेक्युलर नेताओं को शामिल किया जा सकता है। ऐसा करके भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने की कोशिश की जा सकती है।

पहले भी ये दल गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरते रहे हैं। इसमें कुछ दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन यह असंभव नहीं है। यूं भी कांग्रेस और रालोद के लिए अकेले चुनाव लड़ने से बेहतर गठबंधन करना होगा। बिहार के नतीजे के बाद यूपी में भी गठबंधन को लेकर कांग्रेस में नया जोश देखा जा रहा है।

लोकसभा चुनाव के बाद बसपा के लिए भी बदले हालात

राजनीतिक हलकों में एक अटकल यह भी है कि बसपा, कांग्रेस और रालोद मिलकर चुनावी जंग लड़ सकते हैं। बसपा सुप्रीमो यूपी में पिछले कई चुनाव अकेले लड़ती रही हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में लगे झटके और बदले राजनीतिक हालात में महागठबंधन की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

कुछ लोगों का मानना है कि बसपा अपने दम पर भाजपा को चुनौती देने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। कुछ सहयोगियों को साथ लेकर उसकी राह आसान हो सकती है। यह गठबंधन बनने पर सपा और भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान, कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर जनसमर्थन की आस की जा सकती है।

भाजपा, रालोद मिलकर ठोकें ताल
एक राजनीतिक संभावना यह भी है कि बिहार में करारी हार के बाद भाजपा यूपी में नई रणनीति के साथ चुनाव में उतरे। कुछ नए सहयोगियों को साथ जोड़े। सपा-बसपा से मुकाबले के लिए वह पश्चिमी यूपी में रालोद और पूर्वी यूपी में पुराने सहयोगी अपना दल के साथ विधानसभा चुनाव में उतर सकती है। भाजपा दो खेमों में बंटे अपना दल में सुलह की पहल भी कर सकती है। भाजपा और रालोद पहले भी मिलकर चुनाव लड़ चुके हैं।

भाजपा-बसपा में हो महागठबंधन
बिहार चुनाव में हार से सबक लेकर भाजपा, बसपा से महागठबंधन की पहल कर सकती है। हालांकि संभावनाएं कम हैं, लेकिन यूपी की सत्ता पर कब्जे के लिए एक विकल्प यह भी है। बसपा पूर्व में भाजपा की मदद से सरकार चला चुकी है। कई नेता इस बात के समर्थक हैं कि दोनों दलों के बीच चुनावी गठबंधन हो।

शिवपाल का साफ इंकार, बसपा से गठबंधन नहीं

हालांकि वरिष्ठ सपा नेता व कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव का कहना है कि बसपा से गठबंधन नहीं होगा। सपा सांप्रदायिक शक्तियों को अकेले शिकस्त देने में सक्षम है। महागठबंधन समाजवादी विचारधारा वाले दलों से हो सकता है। सपा की नीति है कांग्रेस और भाजपा से बराबर राजनीतिक दूरी बनाकर रखी जाए। यह सपा नेतृत्व को तय करना है कि किन समाजवादी विचारधारा वाले दलों से गठबंधन किया जाए और किनसे नहीं।

दुआ करूंगा, महागठबंधन में आए बसपा
इस सबंध में यूपी के प्राविधिक शिक्षा राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार फरीद महफूज किदवई ने कहा था कि बिहार की तरह यूपी में भी भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बने तो अच्छा है। मैं दुआ करूंगा कि बसपा भी इस महागठबंधन में शामिल हो। वैसे बसपा सुप्रीमो के रुख को देखते हुए इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं लगती। महागठबंधन के संबंध में फैसला पार्टी नेतृत्व को लेना है। मेरी इच्छा है कि सपा ज्यादा से ज्यादा सीटों पर जीते, प्रदेश में दुबारा अखिलेश यादव की अगुवाई में सरकार बने।

यूपी में महागठबंधन की संभावना नहीं
वहीं, राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह का कहना है कि यूपी में बिहार की तरह महागठबंधन की संभावना नहीं है। यहां सपा और बसपा एक साथ आने से रहे। बिहार में महागठबंधन की जीत की एक वजह नीतीश कुमार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान का नहीं होना था। यूपी में सपा सरकार के खिलाफ हर तबके में भारी नाराजगी है। उससे गठबंधन करने का नतीजा बिहार से उल्टा होगा। रालोद का सपा से कोई गठबंधन नहीं होगा।
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चुनाव करीब आने पर गठबंधन की तेज होगी कवायद

इस पर लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे, गठबंधन की प्रक्रिया तेज होगी। बिहार चुनाव के बाद सभी राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा।

सपा बिहार में महागठबंधन से अलग हो गई थी लेकिन यूपी में वह गठबंधन करेगी। सपा-बसपा के बीचमहागठबंधन होगा, इस पर सवालिया निशान है, लेकिन यूपी में कांग्रेस उसकी सहयोगी हो सकती है।

बसपा को इतना तो पता है कि वह अकेले चुनाव लड़कर भाजपा का मुकाबला नहीं कर पाएगी। ऐसे में वह भी गठबंधन का सहारा ले सकती है।

बिहार में करारी हार के बाद भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी होगी। उसे गठबंधन के साझीदारों पर काम करना होगा। हो सकता है वेस्ट यूपी में भाजपा राष्ट्रीय लोकदल की तरफ हाथ बढ़ाए। पूर्वी यूपी में सामाजिक समीकरणों के लिहाज से नए सहयोगी तलाशे जा सकते हैं।
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