इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन अर्थात आपातकाल के चालीस साल होने को आ गए। इसके खिलाफ सड़कों पर आकर संघर्ष करने वाले कुछ लोगों ने राजनीति में मुकाम बना लिया तो कई नेपथ्य में चले गए।
समय के साथ करवट बदलती राजनीति में तानाशाही के खिलाफ एकजुट होने वाले नेता और राजनीतिक दल बिखरते चले गए।
समाजवादी विचारधारा पर चलने का दावा करने वाली पार्टियां कांग्रेस के शासन को कंधे पर टिकाए सामने नजर आईं। इंदिरा विरोधी नारे लगाने के आरोप में जेल गए कई चेहरे बाद में उन्हीं के जिंदाबाद के नारे लगाने लगे।
कुछ का सरकार ने रखा ख्याल
विचारधाराओं की सीमाएं ही नहीं टूटीं, दलों का नेतृत्व करने वाले ही नहीं बदले, बल्कि राजनीतिक दलों का स्वरूप भी बदल गया।
प्रदेश में कुछ दलों का नेतृत्व उन लोगों के हाथ आ गया जिन्हें आपातकाल के किस्से भी ठीक वैसे ही लग सकते हैं जैसे आज की पीढ़ी आजादी की लड़ाई को इतिहास के रूप में पढ़ते हैं।
बहरहाल आपातकाल की मुखालफत करने वाले इन लोगों को एक पहचान मिली। सरकार ने लोकतंत्र सेनानी माना और कुछ सुविधाएं भी दी।
ये थे यूपी के लोकतंत्र सेनानी
यूपी की बात करें तो आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले युवा तुर्क चंद्रशेखर दुनिया में नहीं रहे। चौधरी चरण सिंह, राजनारायण, मोहन सिंह, बृजभूषण तिवारी, माधव प्रसाद त्रिपाठी, सर्वोदयी नेता महावीर भाई, महिपाल शास्त्री, अक्षयवर मल्ल, रामशरण दास, जनेश्वर मिश्र, चंद्रशेखर त्रिपाठी, बद्री प्रसाद अवस्थी, जे.जे. रूपानी, बृजबहदुर सक्सेना, बाबू मूलचंद भी नहीं रहे। गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष रवींद्र प्रताप सिंह, उपाध्यक्ष विनोद तिवारी, पूर्व मंत्री ब्रह्मदत्त द्विवेदी।
इसके अलावा पूर्व मंत्री रवींद्र किशोर शाही, वरिष्ठ पत्रकार बलदेव उपाध्याय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. रघुवंश, प्रो. बनवारीलाल शर्मा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी रहे राजेंद्र शाही, समाजवादी नेता डॉ. हलीम, बाबू बनारसीदास गुप्त, ज्ञानचंद्र द्विवेदी, रामप्रकाश त्रिपाठी, हरिकेवल प्रसाद, लक्ष्मीशरण आनंद, पंडित चंद्रशेखर शास्त्री जैसे न जाने कितने और चेहरे भी आज दुनिया में नहीं हैं।
चलने फिरने को तरसते हैं अटल के एक दोस्त
राजधानी के चौपटिया मोहल्ले में रहने वाले रामसागर मिश्र जैसे बड़े नेता जेल से जिंदा न लौट पाए। बेटा उनकी रिहाई की कामना लेकर दंडवत करते हुए अलीगंज हनुमान मंदिर दर्शन को जा रहा था लेकिन धूप व सड़क की गर्मी से उसकी मंदिर पहुंचने से पहले ही मौत हो गई।
आंदोलन में योगदान करने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरगोविंद सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता विश्व बांधव तिवारी और सर्वोदयी कार्यकर्ता चंद्रदत्त तिवारी, भाजपा नेता गंगाभक्त सिंह भी आज दुनिया में नहीं हैं। राजधानी के बाबू मूलचंद के पुत्र मोती अग्रवाल, वरिष्ठ नेता करुणशंकर वाजपेयी, प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे रामप्रकाश गुप्त, आंदोलन के दौरान भूमिगत रहकर काम करने वाले नानाजी देशमुख जैसे राजनीतिक समाजसेवी नहीं रहे।
देश के पहले मीसाबंदी वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय, वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव पौढ़ हो गए हैं। वहीं रामदत्त त्रिपाठी की भी उम्र धीरे-धीरे बढ़ रही है। राजधानी में पहले दिन ही गिरफ्तार हुए अटल बिहारी वाजपेयी के मित्र व निकट सहयोगी वरिष्ठ पत्रकार बजरंगशरण तिवारी और सामाजिक कार्यकर्ता प्यारेलाल कनौजिया का अकेले चलना-फिरना मुश्किल हो गया।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यप्रकाश मालवीय का स्वास्थ्य भी अब इस काबिल नहीं है कि वे अपनी गतिविधियों को जारी रख सकें। अनंतराम जायसवाल को भी बेंत का सहारा लेकर चलना पड़ रहा है। श्रीनिवास तिवारी भी ऐसे ही हाल में हैं। मुख्तार अनीस भी किसी के सहारे ही चल पाते हैं। मधुकर दिघे व जमुनाप्रसाद बोस भी काफी बुजुर्ग हो चुके हैं।
बड़ा नाम, पर नहीं मिला मुकाम
शतरुद्र प्रकाश और अंजना प्रकाश जैसे चेहरे राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन बड़ा नाम होते हुए भी उन्हें आज की राजनीति में वाजिब मुकाम नहीं मिला। गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष विश्वकर्मा द्विवेदी, दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सहायक व भोंडसी आश्रम के ट्रस्टी सूर्यकुमार, समाजवादी निर्मल सिंह, भाजपा के राजेंद्र तिवारी, विजय सेन सिंह राजनीति में सक्रिय तो हैं लेकिन संघर्ष के अनुकूल प्रतिफल अभी तक नहीं मिल पाया।
वरिष्ठ गांधीवादी सर्वोदयी कार्यकर्ता रामधीरज व मेवालाल गोस्वामी का नाम भी कम लोगों को याद हैं। रघुनंदन सिंह काका, सुभाष छाबड़ा, कस्तूरीलाल तागड़ा, लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे सुरेश बहादुर सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रनेता रहे रामाधीन सिंह जैसे न जाने कितने चेहरे आज नेपथ्य में हैं। वरिष्ठ पत्रकार स्वर्णकेतु भारद्वाज का उस समय जमा जमाया दैनिक अखबार था ‘ बृज प्रदेश’।
आपातकाल की मार ऐसी पड़ी कि जेल से आने के बाद न भारद्वाज संभल पाए और न अखबार। जेपी आंदोलन के चर्चित चेहरे सीबी सिंह वकालत कर रहे हैं। बृजकिशोर मिश्र भी वकील हैं। रमाशंकर तिवारी भाजपा में हैं। बुंदेलखंड के देवीप्रसाद गुप्ता बुंदेलखंड में सामाजिक आंदोलन चला रहे हैं।
लक्ष्मीशंकर ओझा, राम किशोर शास्त्री, जार्ज के साथी विजय नारायण, चंद्रशेखर के साथी सिद्धनाथ सिंह व सुरेश सिंह जैसे कई लोग आज गुमनाम से चेहरे होकर रह गए हैं। एक वाक्य में कहा जाए तो कुछ लोगों को मुकाम मिला तो कुछ आज भी मुकाम पाने को संघर्ष कर रहे हैं। कुछ बगैर मुकाम पाए ही दुनिया से चले गए। कुछ ऐसे हैं जो न तब कुछ चाहते थे और न आज कुछ चाहते हैं।
मुलायम भी थे इंदिरा के खिलाफ
मुलायम सिंह यादव, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं है। ये सभी आपातकाल के दौरान इंदिरा के तानाशाही रवैये के खिलाफ मुखर रहे। जेल भी जाना पड़ा।
गोविंदाचार्य भाजपा से अलग होकर सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय हैं। ऐसे ही चेहरों में शुमार तब विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहे रविदास मेहरोत्रा इस समय समाजवादी पार्टी से विधायक हैं। जेल यात्रा करने वाले शारदा प्रताप शुक्ल भी इस समय सपा के विधायक हैं।
पूरा आपातकाल जेल में काट देने वाले हृदयनारायण दीक्षित भाजपा में हैं और इस समय परिषद में भाजपा विधायक दल के नेता हैं। बाबूराम एमकॉम भी भाजपा से विधायक हैं। अशोक वाजपेयी व भगवती सिंह जैसे नेता समाजवादी पार्टी में है। तब चौधरी चरण सिंह के निकट सहयोगी रहे सतपाल मलिक इन दिनों भाजपा में हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय केअध्यक्ष रहे बृजेश शर्मा कल्याण सिंह सरकार में राज्यमंत्री रहे। शर्मा हैं तो भाजपा में लेकिन नेपथ्य में हैं। विधायक रहे अवधकुमार सिंह बागी भी भाजपा में है लेकिन चर्चा से दूर हैं। शिशु कुमार सिंह बगावत व प्रताप नारायण तिवारी जैसे चेहरे कहां हैं, यह आपातकाल के उनके कई साथी भी नहीं बता पाए।
जिससे लड़े उसी का लिया आसरा
संयोग या समय का फेर देखिए। आपातकाल के दौरान चर्चित रहे कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जो जिस कांग्रेस से लड़ते हुए जेल में गए, बाद में उसी कांग्रेस में पहुंच गए। यह बात अलग है कि कुछ ही टिके। ब्रह्मदत्त कभी चौधरी चरण सिंह के करीबी साथियों में शुमार होते थे।
जेल में भी रहे। बताया जाता है कि जनता पार्टी का संविधान तैयार करने में भी इनकी बड़ी भूमिका रही। पर, जनसंघ को साथ लेने पर चौधरी साहब से अनबन हुई तो अलग हो गए। बाद में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में शामिल कर लिया।
सत्यप्रकाश मालवीय भी बाद में कांग्रेस में पहुंच गए। हर्षवर्धन भी कांग्रेस में गए और पार्टी के टिकट पर सांसद भी बने। मोहन प्रकाश इस समय भी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। रामनरेश यादव भी कांग्रेस में हैं और मध्यप्रदेश के राज्यपाल हैं। हनुमान त्रिपाठी भी ब्रह्मदत्त के साथ कांग्रेस में पहुंच गए थे। कांग्रेस में 31 वर्ष रहने के बाद 2008 में वहां से भी बाहर आ गए। इस समय कहने को बसपा में हैं। सत्यदेव त्रिपाठी भी कांग्रेस में हैं और इस समय प्रदेश कांग्रेस के मीडिया विभाग के इंचार्ज हैं।
कैसे लगा आपातकाल
आपातकाल के समय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश सहमंत्री रहे राजेंद्र तिवारी और उनके छात्र जीवन के साथी सूर्यकुमार तथा निर्मल सिंह जो कुछ बताते हैं उसके अनुसार देश में दो महत्वपूर्ण घटनाएं 12 जून 1975 को एक साथ घटीं।
इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करने वाली याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाया। उन्होंने याचिका को स्वीकार करते हुए इंदिरा के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। साथ ही 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी।
उधर, इसी दिन गुजरात में विधानसभा चुनाव का नतीजा आया जिसमें कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ और कांग्रेस (संगठन) के मोर्चे जनमोर्चा को जनादेश था। इंदिरागांधी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला मानने और कुर्सी छोड़ने से इन्कार कर दिया।
संयोग से उस समय देश में पहले से ही व्यवस्था परिवर्तन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर जेपी का आंदोलन चल रहा था। विपक्ष के कई दल भी इस आंदोलन में शामिल थे। जब इंदिरा ने गद्दी छोड़ने से इन्कार कर दिया तो जेपी के नेतृत्व में ‘इंदिरा गांधी गद्दी छोड़ो’ नारे के साथ दिल्ली में रैली की घोषणा कर दी गई।
...और लग गया आपातकाल
25 जून 1975 को दिल्ली में इंदिरा विरोधी रैली थी। जयप्रकाश नारायण को संबोधित करना था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस समय की मशहूर फिल्म ‘बॉबी’ का प्रसारण करा दिया ताकि रैली में लोग नहीं जुटें।
उस समय सप्ताह में केवल रविवार की शाम फिल्म प्रसारित होती थी। बावजूद इसके रैली सफल रही। इंदिरा गांधी के करीबी चंद्रशेखर ने कांग्रेस का सांसद होते हुए भी रैली के बाद जयप्रकाश नारायण को अपने आवास पर दावत दी। इसमें 80 सांसद भी पहुंच गए। इनमें कांग्रेस सांसद मोहन धारिया, कृष्णकांत और रामधन जैसे लोग भी शामिल थे।
देर रात इंदिरागांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी। रैली के बाद दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में रुके जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार करा लिया। सूचना पाकर चंद्रशेखर मौके पर पहुंचे।
वहां से वह त्रिमूर्ति भवन जाकर इंदिरा से मिले और इस पर आपत्ति जताई। बताया जाता है कि दोनों लोगों में कुछ बहस भी हुई। बाद में चंद्रशेखर ने खुद ही अपनी गिरफ्तारी करा दी। देश भर में गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। अगले दिन 26 जून को लखनऊ सहित पूरे प्रदेश में कई लोग गिरफ्तार हो गए।