एग्जिट पोल अगर पूरी तरह से नतीजों में बदलते हैं तो वाकई यह साबित हो जाएगा कि देश में नरेंद्र मोदी की लहर चल रही है।
वह लहर जिसने उत्तर प्रदेश में पिछले 10 वर्षों से बेजान पड़ी भाजपा में केवल जान ही नहीं डाली बल्कि परचम भी फहरा दिया।
यह भी साबित हो जाएगा कि वास्तव में अमित शाह से लेकर संघ परिवार के रणनीतिकारों का रणकौशल गजब का रहा और उसने एक वर्ष से भी कम समय में भाजपा को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया।
सरकार बनाने का रास्ता ही आसान नहीं बनाया बल्कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा को खारिज करने वालों को आत्ममंथन करने के लिए भी चेता दिया।
भगवा टोली ने किया कमाल
भाजपा या मोदी की लहर की समीक्षा करें तो ऐसा लगता है कि भगवा टोली के रणनीतिकारों ने कमाल ही कर डाला है।
मोदी की यूपी में पिछले वर्ष अक्तूबर में विजय शंखनाद रैली शुरू होने से पहले कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के अच्छे दिन लौटेंगे।
गुटबाजी में उलझे नेता, नेताओं में गणेश परिक्रमा करने वालों को पद-प्रतिष्ठा दिलाने की होड़, एक-दूसरे की टांग खिंचाई...। इस सबसे खुद पार्टी के कई नेता मान चुके थे कि इस हाल में तो यूपी भाजपा का कोई कल्याण नहीं कर सकता।
पर चीजें तेजी से बदलीं तो यह सब रणनीति की सफलता ही है। यूपी की लोकसभा की 80 सीटों में भाजपा को 46 से 54 पर एग्जिट पोल विजयी मानकर चल रहे हैं। कोई-कोई तो इससे भी ज्यादा सीटें दे रहा है।
संभलकर चली गईं चालें
अब ऐसा लगता है कि यूपी की स्थिति के चलते भगवा टोली ने यूपी भाजपा के पुनरुद्धार का खाका इस तरह खींचा कि प्रदेश के नेताओं को पता भी न चले और काम भी बन जाए।
संयोग से दिसंबर 2012 में नरेंद्र मोदी की गुजरात में हैट्रिक बनी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व को मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई।
चूंकि मोदी विकास से लेकर छवि तक के मामले में भगवा मंडली की कसौटी पर खरे उतरते थे, इसलिए संघ ने मोदी को आगे करके पूरी कार्ययोजना बनाई।
इस तरह शुरू हुआ अभियान
यूपी भाजपा के पुनरुद्धार के कई फॉर्मूलों में फेल हो चुका संघ नेतृत्व जानता था कि मोदी के नेतृत्व में देश में सफलता पाने के लिए यूपी में सफल होना जरूरी है।
पर जो अनुभव रहे उससे संघ नेतृत्व को यह भी पता था कि इसके लिए मोदी के विश्वासपात्र को ही यूपी भेजना होगा, जिससे यूपी के भाजपाई नियंत्रण में रहें।
इसी खोज के चलते उसने पिछले साल 19 मई को मोदी के करीबी अमित शाह को प्रदेश प्रभारी बनाकर यूपी भेजा।
वे 12 जून को लखनऊ आए। दो दिन रुके कई लोगों से मिलकर भाजपा की जमीनी स्थिति को टटोला और मीडिया से यह कहकर चले गए कि वे पूरी कार्ययोजना बनाकर लौटेंगे।
इशारों से दी एजेंडे को धार
अमित शाह के यूपी के दूसरे दौरे में यह साफ हो गया कि रणनीति में एजेंडे को धार देना तो शामिल है पर इस सावधानी के साथ कि विरोधी लामबंद न होने पाएं।
भाजपा से छिटक गए अति पिछड़ों व दलितों को पार्टी से जोड़ने का काम किया जाए लेकिन इस तरह कि सवर्ण नाराज न हो जाएं।
यही वजह रही कि शाह ने ऑपरेशन यूपी शुरू करने से पहले 6 जुलाई को अयोध्या पहुंचकर ‘श्रीराम जन्मभूमि मंदिर’ परिसर में माथा टेका।
मीडिया से बातचीत के दौरान मंदिर निर्माण पर प्रतिबद्धता जताई। साथ ही मंदिर आंदोलन का सूत्रपात करने वाले गोरक्ष पीठ के महंत अवैद्यनाथ से भी जाकर मिले।
पर, मोदी ने अपनी रैलियों में शुरू से लेकर अंत तक मंदिर मुद्दे पर खामोशी ओढ़े रखी। सिर्फ प्रतीकों से प्रतिबद्धता जताई।
ऐसे तैयार हुई जमीन
यही नहीं, पार्टी के ही नहीं बल्कि संघ से जुड़े संगठन विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं को शामिल करके सोशल मीडिया से जुड़े कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनाया गया।
संघ के रणनीतिकार शायद भांप चुके थे कि उनके फैसलों से कई बड़े नेता नाराज होंगे और ऐसे में सोशल मीडिया का नेटवर्क काम आएगा। निर्णयों के पक्ष में माहौल बनाकर तथा जनसमर्थन लेकर नाराज होने वाले नेताओं पर दबाव बनाया जा सकेगा। ऐसा हुआ भी।
मोदी को पिछले वर्ष जून में गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में पार्टी की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित कराया गया। इससे कुछ लोग नाराज हुए तो सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना हुई। शांति हो गई।
बात आगे बढ़ी तो 14 सितंबर 2013 को मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करा दिया गया। अब तक संघ यूपी में मोदी को लेकर इस तरह का माहौल बना चुका था कि कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग उनमें तमाम संभावनाएं देखने लगा था।
संघ का फॉर्मूला सटीक बैठा। मोदी की उम्मीदवारी से आडवाणी नाराज हुए तो सोशल मीडिया पर उन्हें आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा। हारकर सभी ने मोदी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया।
पिछड़ों की लामबंदी
पिछड़ों की लामबंदी के लिए भी यूपी के किसी नेता पर भरोसा न करके बिहार के रामेश्वर चौरसिया, सत्येन्द्र्र कुशवाहा को जुटाया गया।
‘मिशन मोदी यूपी’ के सिलसिले में मोदी जब झांसी पहुंचे तो उन्होंने खुद को पिछड़ी जाति का बताकर यूपी के पिछड़ों को साधने के साथ ही यूपी में मुलायम सिंह के वोट बैंक में सेंध लगा दी।
मोदी ने खुद को चाय वाला कहकर गरीबों की हमदर्दी ली। उनकी चाल सटीक बैठी। यहां तक चुनाव संग्राम के अंतिम दिनों ने तो प्रियंका की ‘नीच राजनीति’ की टिप्पणी पर मोदी ने खुद को नीच जाति से जोड़कर मायावती के दलित वोट बैंक में भी सेंध मार दी।
यही नहीं अपनी रैलियों में कहीं निषादराज तो कहीं ऊदा देवी तो कहीं भगवान राम और भगवान कृष्ण की मंचों पर फोटो लगाकर और फिर गंगा के मुद्दे को उठाकर उन्होंने भारतीय संस्कृति की रक्षा के बहाने भगवा मुद्दे को धार दी।
पर, चुनौतियां खत्म नहीं
भाजपा को सत्ता मिलने और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यूपी में भाजपा की चुनौतियां खत्म होने वाली नहीं हैं।
भगवा रणनीतिकार भी जानते होंगे कि इस लहर को यूपी के विधानसभा चुनाव तक बरकरार रखना होगा। यह काम लहर बनाने से ज्यादा मुश्किल है। पर, रणनीतिकारों को यह काम किसी भी कीमत पर करना ही होगा।
सभी को इसका एहसास होगा कि भाजपा का ग्राफ स्थायी तौर पर ऊपर रखने के लिए यूपी में उन्हें भाजपा की सरकार बनवाने का रास्ता तलाशना ही होगा।
अगर यह न हुआ तो मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार यूपी के लोगों की अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाएगी। नतीजा कांग्रेस जैसा ही हो सकता है।