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यूपी: आखिर क्यों बढ़ते जा रहे हैं दंरिदों के हौसले

Sun, 01 Jun 2014 10:46 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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सत्ताधारी दल के मुखिया, प्रदेश के मुख्यमंत्री और पुलिस के आला अधिकारी के ये बयान महिलाओं की सुरक्षा और प्रतिष्ठा के सवाल पर सत्ता की सोच को लेकर अपने आप ही बहुत कुछ बयां कर देते हैं।
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बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के प्रति सरकार की उदासीनता ने प्रदेश के जनमानस की बेचैनी बढ़ा दी है।

जिस सरकार पर कानून के राज का इकबाल बुलंद करने का जिम्मा है, वही यदि ऐसी जघन्य घटनाओं पर टालू रवैया अपनाए तो असामाजिक तत्वों के हौसले किस हद तक बढ़ सकते हैं, इसको लेकर कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती।

सरकार के लिए शर्मनाक है बदायूं कांड

बदायूं में दो चचेरी बहनों के साथ गैंगरेप और पेड़ से लटकाकर हत्या करने के मामले ने व्यभिचारियों के दुस्साहस की पराकाष्ठा की कहानी लिख दी है।

दूसरी तरफ इस पूरे प्रकरण में आरोपियों के प्रति सरकार और पुलिस की सख्ती के बजाय जो रवैया सामने आया, वह किसी भी संवेदनशनील और जिम्मेदार सरकार के लिए शर्मनाक है।

यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसको लेकर लोगों का आक्रोश सामने आया है बल्कि पहले भी इस तरह के कई मामलों को हल्के में लेने पर अखिलेश सरकार की साख गिरी है।

अखिलेश के सामने है बड़ी चुनौती

प्रदेश की जनता माया सरकार के दौरान निघासन कांड की बर्बरता को भी भूली नहीं है। समाजवादी पार्टी को भी याद होगा कि उस घटना के बाद उसने किस तरीके से पूरे प्रदेश में तत्कालीन माया सरकार को निशाने पर लिया था।

आज एक बार फिर अखिलेश सरकार के सामने भी वैसी ही चुनौती खड़ी हो गई है। विपक्ष हमलावर है और पीड़ित पक्ष इंसाफ की गुहार लगा रहा है।

यह सही है कि इस मामले को अब जल्द ही सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाएगा लेकिन क्या राज्य सरकार यह सुनिश्चित करने की जवाबदेही से बच पाएगी कि प्रदेश में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हो।

और अगर ऐसी घटनाएं सामने आती हैं तो त्वरित व न्यायोचित कार्रवाई के साथ वह लोगों के बीच भरोसा लौटाने का काम करेगी।
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

औरतों के प्रति सामाजिक नजरिया बदले बिना उनके प्रति अपराध, खास तौर से बलात्कार जैसी घटनाओं को खत्म नहीं किया जा सकता।

महिलाओं के प्रति हिंसा, बलात्कार की प्रवृत्ति किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। यूं तो हमारा समाज सभ्य, अहिंसक और सहनशील कहा जाता है लेकिन महिलाओं के दमन के मामले में सब कुछ पीछे छूट जाता है।

जब तक समाज में औरत-मर्द, समुदाय और जाति के स्तर पर समानता नहीं आएगी, ऐसी घटनाओं को नहीं रोका जा सकेगा। इसके लिए हमें क्रांतिकारी तरीके से समाजीकरण करना होगा।

परिवारों में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना होगा। महिलाओं को उपभोग की वस्तु और दोयम दर्जे की नागरिक समझने की सोच बदलनी होगी। -डॉ. राजेश मिश्र, समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
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