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जिसने शायर बनाया, शायरी में वो माशूका ही नहीं!

Mon, 02 Sep 2013 02:10 PM IST
लखनऊ/मनोज श्रीवास्तव
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मुनव्वर राना। शायरी की एक अजीम शख्सियत। उनकी गजलों-नज्मों की गूंज सरहद पार भी सुनाई देती है।
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शायरी की शुरुआत किन्हीं मोहतरमा के इश्क में नाकाम होने से हुई थी, पर उनकी गजलों में इश्क, माशूका, हुस्न, गेसू, मयखाना और साकी-पैमाने का जिक्र गैरहाजिर सा है।

पूरी शायरी बचपना, गुरबत, वतन, घर, आंगन और मां से गुलजार है। इस महबूब शायर को गैरउर्दू लिटरेचर पढ़ने का भी जबर्दस्त शौक है, पर रामचरितमानस पढ़ने में जो रस मिला वह कहीं और नहीं।
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‘मोहाजिरनामा’ से ‘मां’ तक उनकी अब तक करीब 22 किताबें बाजार में आ चुकी हैं, पर शोहरत के शिखर पर मां के जरिए ही पहुंचे। बहुतेरे यही समझते हैं कि मुनव्वर ने केवल ‘मां’ लिखी है।

मुशायरों में जब वे मां से जुड़े शेर पढ़ते हैं तो इरशाद... इरशाद की जगह अक्सर सिसकियां सुनाई पड़ती हैं। फुटबॉल के  दीवाने इस शायर को इस बात का भी मलाल है कि वह रंगकर्मी और फिल्मकार ऋत्विक घटक जैसी फकीराना जिंदगी नहीं जी सका।

मलिक मोहम्मद जायसी, महावीर प्रसाद द्विवेदी और राना बेनीमाधव के जिले (रायबरेली) का बाशिंदा बताने में फख्र महसूस करने वाले ये शख्स रहते जरूर लखनऊ में हैं, पर जवानी के दिनों के कोलकाता को याद कर अब भी इमोशनल होते हैं।

खुद के बारे में पूछो तो हंस कर बस इतना कहते हैं-
वक्त की सीढ़ियों पर लेटे हैं
इस सदी के कबीर हैं हम

मुनव्वर अपने शुरुआती दिनों को याद करते हैं, 'जवानी के दिन थे। कलकत्ते में रहता था। पड़ोस की एक मोहतरमा पर दिल आ गया, पूरी संजीदगी के साथ। निकाह की बात भी चली, पर उनका खानदान बड़ा था, मैं एक ट्रक ड्राइवर का बेटा था। वालिद ने अपनी टोपी तक मोहतरमा की मां के पैरों पर रख दी, लेकिन बात नहीं बनी।'

जिस दिन मोहतरमा की शादी थी, मैं पागल सा हो गया। सारी रात बदहवास सा पैदल कलकत्ते शहर में घूमता रहा था। खुदकुशी तक का ख्याल आया। खैर...किसी तरह संभला पर शायरी उसी के बाद परवान चढ़ी।

राना ने बताया कि जब संभला और दुनिया को हकीकत के चश्मे से देखा तो सब बदल गया। घर-परिवार-समाज की जिम्मेदारियों का अहसास होने पर मुझे भी महसूस हुआ कि...और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा...।
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फिर तो चांद-सितारों की तरफ देखने का मन ही नहीं हुआ। अब तो मैं बस इतना कहता हूं कि गजल के माने महबूब से गुफ्तगू करना होता है। तुलसी के महबूब राम थे और मेरी महबूब मां है, बस मां।
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