यदि आपके चेहरे पर झुर्रियां आ रही हैं, चेहरा एक तरफ लटक रहा है अथवा गड्ढे बन गए हैं तो चिंता न करें। एसजीपीजीआई ऐसे लोगों के लिए नई क्लीनिक खोलने जा रहा है। इन सभी समस्याओं के लिए अब सर्जरी की जरूरत नहीं होगी बल्कि इनका अंत सिर्फ एक इंजेक्शन से हो जाएगा। नॉन सर्जिकल कास्मेटिक इलाज के तहत बाटूलियनम टॉक्सिन इंजेक्शन और डरमल फिलर इंजेक्शन लगाए जाएंगे। इसके बारे में चिकित्सकों को प्रशिक्षित भी किया जाएगा।
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नई तकनीक की जानकारी देते डॉ अंकुर व अन्य
- फोटो : अमर उजाला
प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर अंकुर भटनागर व नेत्र रोग विभाग की प्रोफेसर रचना अग्रवाल ने बताया कि आमतौर पर हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री, मॉडलिंग, फिल्म इंडस्ट्री, टीवी जर्नलिज्म आदि से जुड़े लोग चेहरे की चमक बनाए रखने पर खासतौर से ध्यान देते हैं। प्लास्टिक सर्जरी के जरिए पूरे चेहरे को दुरुस्त रखना खर्चीला होता है और इसमें समय लगता है। ऐसे में यह नॉन सर्जिकल प्रयोग काफी कारगर माना गया है। उम्र बढ़ने के साथ चेहरे पर झुर्री आने, आईलिड गिरने (आंख की बरौनी), निखार कम होने और चेहरे पर गड्डे बन जाने पर अब इंजेक्शन के जरिए इलाज किया जा सकेगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
झुर्रियों आदि के लिए बाटूलियनम टॉक्सिन इंजेक्शन दिया जाता है। यह इंजेक्शन एक तरह के बैक्टीरिया से बना केमिकल है। इसी तरह चेहरे का मांस लटकने व गड्डे होने पर डर्मल फिलर इंजेक्शन का प्रयोग किया जाता है। यह करीब 30 मिनट में आसानी से हो जाता है। एक मरीज पर करीब 10 से 15 हजार रुपये खर्च होता है। इसे छह से आठ माह बाद दोबारा कराना पड़ता है। लेकिन किस मरीज में कितने इंजेक्शन का प्रयोग करना है, इसका आकलन करना बेहद जरूरी है।
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नई तकनीक की जानकारी देते डॉ अंकुर
- फोटो : अमर उजाला
पांच लोगों पर किया जाएगा प्रयोग
प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर अंकुर भटनागर व प्रो. अनुपमा सिंह, नेत्र रोग विभाग की प्रो. रचना अग्रवाल, डॉ. ऋचा ने शुक्रवार को आयोजित प्रेसवार्ता में बताया कि शनिवार को आयोजित कार्यशाला में पांच मरीजों पर यह प्रयोग किया जाएगा। कार्यशाला में अलग-अलग स्थानों के सात विशेषज्ञ अपने अनुभव बताएंगे और लाइव प्रजेंटेशन के जरिए अन्य डॉक्टरों को जानकारी देंगे। करीब आधे घंटे बाद मरीज को छुट्टी दे दी जाती है।
अभी तक ऐसे लोगों की फेस लिफ्ट, राइनोप्लास्टी सहित अन्य सर्जरी की जाती है। इसमें लंबा वक्त लगता था और संबंधित व्यक्ति को भी क ाफी ध्यान रखना पड़ता है। एसजीपीजीआई में चलने वाली कार्यशाला का टेली मेडिसिन के जरिए चार चिकित्सा संस्थानों में लाइव डिमॉन्स्ट्रेशन भी किया जाएगा।