स्वामी प्रसाद मौर्य ने ये तस्वीर एक्स पर पोस्ट की थी।
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समकालीन यूपी के मामलों के जानकार जेएनयू से सेवानिवृत्त प्रो. रवि श्रीवास्तव मानते हैं कि उत्तर भारत और खासकर यूपी की राजनीति में धर्म का प्रभुत्व काफी बढ़ा है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मध्य प्रदेश चुनाव के दौरान मां नर्मदा के दर्शन करते हैं, उनकी पत्नी डिंपल यादव हाल ही में केदारनाथ के दर्शन करके लौटी हैं। राहुल और प्रियंका गांधी भी मंदिरों में जाकर तिलक लगाना नहीं भूलते। ऐसे में स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण को बढ़ावा ही देंगे। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के परिणाम पिछले चार चुनावों में हम देख ही चुके हैं कि यूपी संघ परिवार का गढ़ बनकर उभरा है। वे कहते हैं कि जिस तरह से आडंबरों के खिलाफ अतीत में देश के अलग-अलग हिस्सों में दलित आंदोलन हुए, उसकी संभावना भी निकट भविष्य में यूपी में कहीं भी नजर नहीं आती। ऐसे में धार्मिक आलोचना से भरे बयानों के जरिये समाजवादी पार्टी समेत समूचे विपक्ष की राजनीति को नुकसान ही पहुंचने की ज्यादा संभावना है।
ये बयान सोची-समझी रणनीति का हिस्सा
राजनीतिक मामलों के जानकार लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिक विभाग के प्रो. संजय गुप्ता कहते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य के हिंदू धर्म की आलोचना संबंधी बयानों पर सपा के शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी के पीछे भी खास रणनीति है। सपा दलितों को अपने साथ लाना चाहती है। स्वामी प्रसाद के सहारे इस काम को अंजाम देने का उसका इरादा है, क्योंकि उनकी बसपा की पृष्ठभूमि रही है। ज्योतिबा फुले और पेरियार समेत सभी प्रमुख दलित समाज सुधारकों ने धर्म के नाम पर होने वाले आडंबरों पर निशाना साधा। अब स्वामी प्रसाद को भी लगता है कि हिंदू देवी-देवताओं, मंदिरों व ग्रंथों के खिलाफ निंदा से भरे बयान देकर दलितों के एक तबके को अपने से जोड़कर चुनावी लाभ लेने में कामयाब होंगे।