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समाजवादी पार्टी ने दी शिवपाल की सदस्यता रद्द करने की याचिका, चाचा-भतीजे की जंग निर्णायक दौर में

Fri, 13 Sep 2019 04:23 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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Akhilesh Yadav-Shivpal Yadav
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यादव परिवार में तीन साल से चल रही चाचा और भतीजे की जंग निर्णायक दौर में पहुंच गई है। समाजवादी पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष के यहां याचिका दायर कर शिवपाल सिंह यादव की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग की है।
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विधानसभा में सपा के नेता और नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी की तरफ से दायर इस याचिका में जसवंतनगर सीट से सपा विधायक शिवपाल पर दलबदल का आरोप लगाया गया है। विधानसभा सचिवालय ने याचिका दायर होने की अधिसूचना जारी कर दी है। वैसे तो राजनीति में अंतिम कुछ भी नहीं होता लेकिन याचिका दायर होने से यादव परिवार में सुलह-समझौते की बची-खुची गुंजाइश भी खत्म होती लग रही है।

माना जा रहा है कि याचिका कराकर अखिलेश ने साफ कर दिया है कि अब चाचा शिवपाल के साथ उनका समझौता नहीं हो सकता। अखिलेश से 2016 में शुरू हुई तनातनी के बाद अब तक कई बार सुलह-समझौते की खबरें चलीं लेकिन हकीकत में नहीं  बदली। इस बीच दोनों तरफ से बयानबाजी भी होती रही। मामला उस समय और तूल पकड़ गया जब अखिलेश और प्रो. रामगोपाल ने 2017 में सपा से ही चुनाव लड़ रहे शिवपाल के खिलाफ जसवंतनगर में वोट मांगे।
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सपा को झटका

विधानसभा चुनाव के बाद शिवपाल थोड़े दिन तो चुप रहे लेकिन जब बयानबाजी होती रही तो उन्होंने पहले सेकुलर मोर्चा बनाकर और बाद में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया (पीएसपी लोहिया) बनाकर अलग राह चलने का इरादा साफ कर दिया। 

हालांकि तकनीकी रूप से सपा विधायक होने के नाते वह खुद इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बने। इस वर्ष लोकसभा चुनाव के दौरान पीएसपी ने कई सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतारे थे। शिवपाल खुद फिरोजाबाद में अपने ही भतीजे अक्षय यादव के खिलाफ लड़े। 

शिवपाल खुद तो नहीं जीते लेकिन अक्षय हार गए। यादव परिवार के गढ़ कन्नौज और बदायूं में भी सपा को हार का सामना करना पड़ा। कन्नौज में अखिलेश की पत्नी डिंपल हार गई तो बदायूं में अखिलेश के खेमे में ही खड़े धर्मेन्द्र यादव को पराजय का सामना करना पड़ा। इसके पीछे शिवपाल के अलग होना प्रमुख कारण माना गया।
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यह है पूरा मामला

यादव परिवार में तनातनी 2016 के अंत में ही तभी शुरू हो गई थी जब शिवपाल मुलायम सिंह यादव के साथ खड़े होकर अखिलेश का विरोध किया। प्रो. रामगोपाल अखिलेश यादव के साथ खड़े हो गए। वर्ष 2017 की शुरुआत होते-होते यह तनातनी वर्चस्व की लड़ाई में बदल गई। 

अखिलेश यादव ने सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर उससे प्रस्ताव पारित कराकर राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी ले ली दूसरी तरफ मुलायम सिंह ने भी खुद को अध्यक्ष बताते हुए विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की घोषणा कर दी। 

बाद में चुनाव आयोग के अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष मान लेने के कारण मुलायम की सूची के प्रत्याशियों को साइकिल चुनाव चिह्न न मिल पाने के कारण कई मैदान से हट गए। पर, जसवंतनगर में शिवपाल के मुकाबले कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं मिला। आखिरकार शिवपाल  ही चुनाव लड़े। 

यह बात दीगर है कि चुनाव के दौरान अखिलेश और प्रो. रामगोपाल ने जसवंतनगर में सपा उम्मीदवार होते हुए भी शिवपाल को हराने का आह्वान किया लेकिन वह चुनाव जीत गए।   
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