बसपा ने प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर या प्रदेश सरकार बनाने के लिए तो गठबंधन किए लेकिन अभी तक लोकसभा चुनाव के लिए वह अकेले ही मैदान में उतरती रही है। यह बात अलग है कि 1991 में बसपा के संस्थापक कांशीराम को लोकसभा में भेजने के लिए मुलायम सिंह यादव ने मदद की थी।
उसी मदद का नतीजा था कि कांशीराम और मुलायम की नजदीकी ने 1993 में सपा और बसपा का गठबंधन कराया। पर, यह पहला मौका होगा जब बसपा लोकसभा चुनाव में गठबंधन करके उतरने की तैयारी कर रही है।
लोकसभा चुनाव 1989 में पहली बार बसपा के दो सदस्य पहुंचे थे। इसके बाद यह संख्या क्रमश: बढ़कर 2009-2014 में 21 तक पहुंच गई। 2014 में बसपा को 19.60 प्रतिशत वोट मिले लेकिन सीट एक भी नहीं मिल पाई। सपा को 22.20 प्रतिशत वोट मिले और इसे लोकसभा की सिर्फ पांच सीटों पर जीत मिली। सपा और बसपा के वोट प्रतिशत को जोड़ दिया जाए तो यह 41.80 प्रतिशत पहुंच जाता है।
भाजपा को 42.30 प्रतिशत वोट मिले थे और इसके उम्मीदवार 71 सीटों पर जीते। इसके बाद विधानसभा 2017 के चुनाव में भी सपा को 21.8 प्रतिशत और बसपा को 22.2 प्रतिशत वोट मिले। मतलब सपा का तो वोट प्रतिशत कुछ घटा लेकिन बसपा का बढ़ गया। यह मिलकर 44 प्रतिशत हो जाता है। इसके बावजूद सपा और बसपा को क्रमश: 47 व 19 सीटें ही मिलीं। भाजपा को 39.7 प्रतिशत वोट ही मिला।
मतलब लोकसभा चुनाव के मुकाबले लगभग 2.10 प्रतिशत कम। बावजूद इसके पार्टी के 312 विधायक जीते। संभवत: इसी गणित ने सपा को कांग्रेस के बजाय बसपा के साथ रिश्ते बनाने को मजबूर किया है तो बसपा को भी लग रहा है कि सपा को साथ लिए बिना आगे बढ़ पाना मुश्किल है। कोई जरूरी नहीं है कि चुनाव में मत प्रतिशत का यही आंकड़ा दोहराया जाए लेकिन फिलहाल आंकड़ों के आधार पर सपा और बसपा का गठबंधन भाजपा के साथ लोकसभा चुनाव की लड़ाई को कांटे की बनाता दिख रहा है।