आज बांग्लादेश युद्घ की विजय की 45वीं वर्षगांठ है। युद्घ में रणकौशल का परिचय देने वाले छावनी में रहने वाले वीर सैनिकों से गुरुवार को अमर उजाला ने बातचीत की। जिसमें उन्होंने बताया पाकिस्तानियों के बंकर पहाड़ी पर थे और पिता हवलदार कुंवर सिंह चौधरी दल के साथ नीचे।
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पहाड़ी पर काबिज दुश्मनों को खदेड़ना था। कई दिन के अथक प्रयास के बाद जब सफलता नहीं मिली तो पिताजी ने कुछ सैनिकों को इकट्ठा किया और मानव पिरामिड की मदद से पहाड़ी पर चढ़ाई कर दी। दुश्मनों से जबरदस्त मुठभेड़ हुई।
कोलकाता के पास पाकिस्तानियों से युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले गढ़वाल राइफल्स के हवलदार कुंवर सिंह चौधरी की वीरता का किस्सा सुनाते हुए उनके बेटे नरेंद्र सिंह चौधरी की आंखें नम हो जाती हैं।
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शुक्रवार को विजय दिवस की वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर छावनी के मार्टियर्स होम में रहने वाले नरेंद्र ने कहा, पिता केरणकौशल को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। वहीं हवलदार गोपाल दास जोशी के बेटे व बैंककर्मी ललित जोशी बताते हैं कि जब पिता 1971 की लड़ाई में शामिल हुए तो वह नौ साल के थे।
मार्टियर्स होम के डी-1 मकान नंबर में रहने वाले सिपाही अजयवीर सिंह यादव ने बताया कि युद्ध के दौरान वह बिलोनिया सेक्टर में थे। वहां नदी में दुश्मनों ने करंट उतार रखा था। कई दिन तक इंतजार के बाद सेना ने नदी पर पुल बनाया और उस पार पहुंचते ही दुश्मनों का सफाया कर दिया।
वह जाट रेजीमेंट में थे और युद्ध के दौरान उनका पैर जख्मी हो गया था। वहीं गार्ड रेजीमेंट के सिपाही अजयपाल शर्मा ने बताया कि विजय दिवस आते ही युद्ध की यादें ताजी हो जाती हैं और सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
गार्ड मोहम्मदीन की पत्नी रईशा बेगम ने बताया कि वह छुट्टी पर घर आए थे। छुट्टी पूरी भी नहीं हुई थी कि टेलीग्राम आया और वह चले गए। कुछ दिनों बाद जानकारी मिली कि वह युद्ध में शहीद हो गए हैं। आज घर की हालत यह है कि नाती-पोते सिलाई-कढ़ाई कर जीवनयापन कर रहे हैं।
बांग्लादेश की मुक्ति के लिए वर्ष 1971 में पाकिस्तानी सेना की चूलें हिला देने वाले भारतीय सेना के जांबाज एक अदद छत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वह भी अपनों से। बावजूद इसके जांबाज सैनिक व शहीदों के परिवारीजनों को इसका मलाल नहीं।
लेकिन एक आशियाने के लिए चल रहा यह संघर्ष उनकी आंखों में गाहेबगाहे उतर ही आता है। छावनी में ऐसे जांबाजों के लिए मार्टियर्स होम बनाया गया है। युद्घ में शामिल हुए हवलदार कुंवर सिंह चौधरी के परिवारीजन बताते हैं कि 1972-73 में राज्य सरकार और सेना के संयुक्त प्रयास से मार्टियर्स होम बसाया गया, जिसमें बांग्लादेश युद्घ में शामिल सैनिकों के 16 परिवारों को बसाया गया है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने सैनिकों के लिए हजार से 15 सौ स्क्वायर फुट के मकान बनवाए। दावा किया गया था कि पांच वर्ष तक एक रुपये प्रतिवर्ष की दर से किराया होगा। इसके बाद मकान उपहार स्वरूप दे दिए जाएंगे।
वहीं वीर सैनिक हवलदार गोपाल दास जोशी के परिवारीजन बताते हैं कि करीब 20 साल बाद मकान के बाबत पहली बार नोटिस आया। इसके बाद कागजों की छानबीन सहित आए दिन जांच होती है जिससे जूझना पड़ता है।
बिलोनिया सेक्टर में पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ाने वाले सिपाही अजयवीर सिंह ने बताया कि सरकार की ओर से यह मकान हमें दिए गए हैं, बावजूद इसके हमें अपनों से ही संघर्ष करना पड़ रहा है।
लेकिन हमें इसका मलाल नहीं है। सिपाही अजय पाल शर्मा भी तल्ख लहजे में शिकायत दर्ज कराते हैं कि मार्टियर्स होम में शिकायतों का अंबार है, जिनकी कहीं सुनवाई नहीं। सिर्फ चुनाव में ही नेता नजर आते हैं। इसके बाद बिजली, सड़क, पानी की समस्याओं को कोई सुनने वाला नहीं।
इनका आशियाना है मार्टियर्स होम
हवलदार कुंवर सिंह चौधरी, हवलदार गोपाल दास जोशी, सिपाही कुंडल सिंह भंडारी, हवलदार आनंद सिंह बिष्ट, सिपाही अजयवीर सिंह यादव, सिपाही अजयपाल शर्मा, नायक मदन सिंह रावत, सिपाही चंदर सिंह पांग्ती, सिपाही आन सिंह, सिपाही मंजुल मिश्र, अमृतलाल, राजा सिंह, पान सिंह तोमर, सिपाही मोहम्मदी, मोहन सिंह।
‘मार्टियर्स होम के बाबत सेना के संबंधित अधिकारियों से बात हुई है। वह कागजों की पड़ताल करने के बाद ही इस विषय पर कुछ जानकारी दे सकेंगे।’-गार्गी मलिक, पीआरओ, मध्य कमान