अब चुनाव उस दौर में है जहां की धरती ज्ञान-विज्ञान, राग-विराग, योग-वियोग, राजयोग, सियासत में साधु, धर्म में नए मर्म व दर्शन के लिए जानी जाती है। सगुण उपासकों की धरती पर निराकार ब्रह्म के साधक कबीर के निर्गुण काव्य से जीव, जगत और ईश के रिश्तों का नया दर्शन देती है। यहां साहित्य में नए शब्दों व शैली, राजसत्ता पर धर्मसत्ता की श्रेष्ठता, समाज की समृद्धि की आकांक्षा में राज्यों की सुव्यवस्थता सुनिश्चित करने जैसे प्रयोगों व उनके परीक्षण के अनगिनत उदाहरण हैं।
बलरामपुर से बस्ती और बलिया तक विस्तार लेती छठवें चरण के चुनाव की धरती पर इस बार हुए प्रयोगों और उनके परिणामों पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। खासतौर से तब जब केंद्र और प्रदेश में भाजपा के
सत्तारूढ़ होने के बाद हुए परिवर्तनों और प्रयोगों को करने वाले पात्रों में शामिल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मैदान में खुद परीक्षा दे रहे हों। निगाहें टिकें भी क्यों नहीं, आखिर फिराक गोरखपुरी जैसे शायर ने इस जमीन को लेकर यूं ही ये थोड़े लिखा था...
बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
इस धरती की अलग तासीर है। सनातन संस्कृति के केंद्र में रही भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या की धरती से पौराणिक और आध्यात्मिक रिश्ता रखने वाले तमाम योगियों, ऋषियों, मुनियों, दार्शनिकों, साहित्यकारों की जन्म व कर्मभूमि से काफी ऊर्जावान होती चली गई। प्रयोगों और परीक्षा से निकलने वाले परिणामों के आधार अध्यात्म एवं कर्मयोग के नए-नए सूत्र गढ़ने वाले इस इलाके के लोगों ने देशकाल और परिस्थिति के अनुसार प्रयोग व परीक्षण करने और परिणाम देने शुरू कर दिए। कभी किसी को सबक सिखाकर तो कभी किसी का साथ देकर। ऐसे में सबकी जुबान पर 2022 के नतीजों में इस इलाके की भूमिका का सवाल गूंजना स्वाभाविक है।
हर दल को मिला यहां का साथ
कभी कांग्रेस तो कभी बसपा, कभी समाजवादी तो कभी राष्ट्रवादी राजनीति को महत्व देने के प्रयोग इस धरती पर दिखाई देते रहे हैं। प्रयोग हों भी क्यों नहीं, आखिर इस जमीन का इतिहास और उसके सरोकार रहे ही ऐसे हैं। राजकुमार सिद्धार्थ को गौतमबुद्ध के रूप में गढ़कर उनके माध्यम से दर्शन व योग से बौद्ध धर्म नाम से एक नए आध्यात्मिक मार्ग का दर्शन दिखाकर, तो शैव और योग के समन्वय के दर्शन से नाथ संप्रदाय की स्थापना से सनातन संस्कृति की रक्षा को शास्त्र एवं शक्ति के योग के महत्व और उनके प्रयोग में संतुलन की कला सिखाकर ये धरती धर्म-दर्शन में कर्म और राजधर्म के महत्व को भी समय-समय पर समझाती रही है। इसीलिए जब अटल बिहारी वाजपेयी को लखनऊ और मथुरा ने नहीं पहचाना, तब बलरामपुर ने उनके भीतर छिपे भविष्य के सियासी महानायकत्व को पहचान कर, उन्हें अपना सांसद बनाकर लोकसभा भेजकर साबित कर दिया कि इस धरती की नजर बेहद पारखी है।
अनुमान लगाना काफी मुश्किल : प्रख्यात समाजवादी डॉ. राममनोहर लोहिया की जन्मभूमि अंबेडकरनगर से लेकर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक मंगल पांडेय के पैतृक जिला बलिया तक फैले इस मैदान के कई इलाके अनिश्चितता से भरे और आश्चर्यचकित करने वाले सियासी प्रयोगों व परिणामों के लिए पहचाने जाते हैं। साल 2012 में सिद्धार्थनगर, बस्ती, संतकबीरनगर की 11 सीटों में सिर्फ एक बांसी पर भी जीत हासिल करने वाली भाजपा 2017 में गठबंधन में शामिल अपना दल, भारतीय समाज पार्टी की एक-एक सीट सहित सभी 11 पर झंडा फहरा देती है। ऐसे कई उदाहरण हैं।