माहवारी और माहवारी स्वच्छता को लेकर कायम सामाजिक वर्जनाएं अब टूट रही हैं। युवतियां इस पर बेझिझक बात और साफ-सफाई पर भी ध्यान दे रही हैं। केजीएमयू के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की ओर से हुए सर्वे में यह खुलासा हुआ है।
स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रो. सुजाता देव ने बताया कि माहवारी भले ही हर महिला के लिए प्राकृतिक हो, पर इसे लेकर काफी भ्रांतियां हैं। इसी को ध्यान में रखकर 200 किशोरियों और युवतियों पर सर्वे किया गया। सर्वे में शामिल युवतियों और किशोरियों की औसत आयु करीब 20 साल थी। सर्वे में देखा गया कि 74 फीसदी युवतियां और किशोरियां माहवारी के मुद्दे पर खुलकर बात करने में सहज थीं। यह सकारात्मक संकेत है कि अब समाज में इस विषय को लेकर चुप्पी धीरे-धीरे टूट रही है। उन्होंने यह भी बताया कि यह जानकारी उन्हें विशेष रूप से स्कूल से मिली।
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अभी भी झेलने होते हैं प्रतिबंध : सर्वे में यह भी पाया गया कि 59.5% युवतियों को माहवारी के दौरान विभिन्न तरह के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। जैसे-रसोई में जाना मना है, मंदिर या पूजा में शामिल नहीं हो सकतीं, किसी चीज को छूना मना है, कपड़े या बिस्तर अलग रखे जाते हैं।
यहां अभी कायम हैं चुनौतियां: माहवारी को लेकर स्वच्छता और बातचीत में भले ही सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं, लेकिन अब भी इसमें काफी चुनौतियां कायम हैं। 59% किशोरियों व युवतियों ने कहा कि पीरियड्स की वजह से वे स्कूल, कॉलेज या कार्यस्थल पर नहीं जा पाती हैं। केवल 49.5% लड़कियों को ही साफ और निजी शौचालय उपलब्ध थे। इसका सीधा असर स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और पढ़ाई या काम में भागीदारी पर पड़ता है। कई स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं होते, या वे गंदे होते हैं।
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थोड़ी और जरूरत: सर्वे के अनुसार 73% लड़कियों एवं युवतियों ने बताया कि उनके लिए मासिक धर्म के उत्पाद (जैसे सैनिटरी पैड, कप आदि) सस्ते और उपलब्ध हैं। वहीं 27% को अब भी इन उत्पादों को खरीदने में मुश्किल होती है। उनका कहना है कि ये उत्पाद महंगे हैं। ऐसे में ये माहवारी के दौरान पुराने कपड़े या अस्वच्छ चीजें इस्तेमाल करती हैं।