समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में जनता दल (यू) के अध्यक्ष शरद यादव की मौजूदगी ने एक बार फिर तीसरे मोर्चे की अटकलों को जन्म दे दिया है। कोशिशें पुराने जनता परिवार को एकजुटता करने की हैं। शरद ने संपूर्ण न्याय और इंसानियत के लिए गांधी, जेपी, लोहिया, चरण सिंह, कबीर एवं रहीम के विचारों को देश के लिए जरूरी बताकर गैर भाजपा, गैर कांग्रेस दलों की एकता की संभावनाओं को बरकरार रखा है।
सपा का सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब देश में व्यापक राजनीतिक बदलाव हो चुका है। कुछ महीने पहले ही देश में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है। उत्तरी भारत में सभी दलों को तगड़ा झटका लगा है।
इस करारी शिकस्त से उबरने की जद्दोजहद के बीच सपा के अधिवेशन में शरद यादव की मौजूदगी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शरद ने कहा भी कि यूपी, बिहार और झारखंड में भाजपा को 110 सीटें मिलने से दिल्ली में उसकी सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ है।
इनमें यूपी में भाजपा को 73 और उसके सहयोगी अपना दल को दो सीटें मिलीं। बिहार में भाजपा को 32 सीटें मिलने से सबक लेते हुए नीतीश कुमार और लालू यादव जैसे प्रतिद्वंद्वी एक साथ आ गए हैं। इस प्रयोग को दूसरे राज्यों में भी दोहराया जा सकता है।
यूपी में भाजपा विरोध की धुरी सपा
उत्तर प्रदेश में भाजपा विरोधी एकजुटता की धुरी समाजवादी पार्टी है। लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता नहीं खुला। पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में आधार रखने वाले अजित सिंह भी अपना घर नहीं बचा सके।
मोदी की आंधी में थोड़ी-बहुत टिकी तो सपा। भले ही मुलायम सिंह यादव परिवार के सदस्य ही चुनाव जीते हैं लेकिन यूपी में पांच सांसद सपा के ही हैं। शरद यादव को साथ लाकर मुलायम यूपी ही नहीं, उत्तर भारत में भाजपा विरोधी दलों के अगुवा बन सकते हैं।
बिछड़ों को साथ मिलाने की मुहिम
सपा सम्मेलन में शिकरत से पहले शरद यादव ने मीडियाकर्मियों से बातचीत में भविष्य में सपा के साथ गठबंधन के सवाल पर सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की। हां, इतना जरूर कहा कि नई राजनीतिक परिस्थितियों में उनकी कोशिश पुराने जनता परिवार को एकजुट करने की है।
जनता परिवार के लोग कई राजनीतिक दलों में बंटे हुए हैं। शरद ने कहा, डॉ. लोहिया यूपी-बिहार में ऐसा हिंदुस्तान खड़ा कर गए हैं, जहां गरीबों को कोई रोक नहीं पाएगा। अगली जंग गंगा के मैदान (यूपी, बिहार) में होगी।
मुलायम की इन बातों के कई मायने
मुलायम ने अपने संबोधन में यह साबित करने की कोशिश की कि डॉ. लोहिया और चौधरी चरण सिंह के विचारों में टकराव नहीं है। उन्होंने कहा, चौधरी साहब ने माना कि लोहिया ने किसानों के लिए काम किया। चौधरी साहब चीन के समाजवाद के पक्षधर नहीं थे। लोहिया का समाजवाद भी चीन से प्रभावित नहीं है।
सुल्तानपुर अधिवेशन में किसानों की लगान माफी का विरोध करने वाले चरण सिंह ने बाद में इससे सहमति जताई थी। मुलायम की इस टिप्पणी के भी मतलब निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि 12 अक्तूबर को मेरठ की रैली में चौधरी चरण सिंह के पुराने कुनबे के लोग जुटेंगे। इसमें मुलायम भी शामिल हो सकते हैं। उनकी टिप्पणी भविष्य में एकता की धुरी बन सकती है।
पिछड़ों की एकता पर जोर
शरद ने यहां तक कहा कि योजनाबद्ध तरीके से अति पिछड़ी जातियों को उनके पुश्तैनी पेशे के साथ ही गुर्जर, जाट, अहीर को गाय, भैंस और खेतों से बांध दिया गया। एक तरह से शरद ने इन जातियों की एकजुटता का संदेश दिया।
उन्होंने गांव, गरीब, दलितों और पिछड़ों के हितों को लेकर भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया। सपा भी गांव, गरीब और किसान पर फोकस करती है। इन्हीं के आधार पर जनता परिवार की एकता को परवान चढ़ाने की कोशिश हो सकती है।