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जगतगुरु शंकराचार्य ने काटजू को पर्दे में पाप करने की दी नसीहत

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पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के वक्तव्य पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि वे चाहे तो गोमांस खाते रहें, लेकिन पाप पर्दे में रहकर किया जाता है। इस पर उन्हें सार्वजनिक रूप से बात करने की जरूरत नहीं है।
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जगदगुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम ने लखनऊ में अधिवक्ता परिषद की ओर से गन्ना संस्थान सभागार में आयोजित प्रदेश स्तरीय अधिवेशन के समापन समारोह में रविवार को यह बात कही।

उन्होंने कहा कि गाय के मांस में सेप्टिक तत्व होता है और एंटी सेप्टिक तत्व दूध, मूत्र व गोबर में। ऐसे में गोमांस खाने की हमारी संस्कृति में मनाही है। जो गोमांस खाते हैं, वे दमे, कुष्ठ, टीबी जैसे रोगों से पीड़ित हो जाते हैं।
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चौतरफा निंदा से ही रुकेंगी गोहत्या जैसी घटनाएं जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज का कहना है कि गोहत्या या गोमांस सेवन करने वाली घटनाओं को रोकने के लिए इसकी चौतरफा निंदा जरूरी है।

अधिवेशन के बाद ‘अमर उजाला’ ने जब उनसे सवाल किया कि आए दिन होने वाली गोकशी, गोमांस बिक्री की घटनाओं को कैसे रोका जाए, शंकराचार्य ने कहा कि अज्ञानतावश लोग बहकावे में आकर कई बार ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।

ऐसे कृत्य जब सामने आएं तब इसकी निंदा करनी चाहिए। इससे ही शायद इन घटनाओं को अंजाम देने वालों की आंखें खुलें। ऐसे मामलों में सरकार को भी कड़ा रुख अपनाना चाहिए, सतर्कता भी कई स्तर पर बढ़ाई जानी चाहिए।
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धर्मानुकूल संविधान लिखने की जरूरत

‘जिस समय संविधान का निर्माण हुआ, देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर पाप किया गया। धर्मनिरपेक्षता एक अर्थहीन शब्द है, इसे जोड़कर जो गलती की गई, उसे आपको, हमको, सबको भोगना होगा। इसी वजह से देश पतन की ओर जा रहा है, बूढ़ों के लिए आश्रम खोलने पड़ रहे हैं, सामाजिक न्याय की बात करनी पड़ रही है।’ जगदगुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम ने गन्ना संस्थान सभागार में आयोजित प्रदेश स्तरीय अधिवेशन के समापन समारोह में रविवार को यह बात कही। उन्होंने कहा कि आज संविधान के पुनर्रचना की जरूरत है, जो धर्म के अनुकूल हो।

राजराजेश्वराश्रम ने कहा कि कोई भी व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता। जिन तत्वों से वह बना है, हर तत्व का अपना धर्म है। अग्नि दाहक धर्म रखती है, तो पानी शीतल धर्म का है। जब तत्व ही धर्मनिरपेक्ष नहीं तो व्यक्ति कैसे धर्मनिरपेक्ष होगा?

उन्होंने अपने बचपन का उल्लेख करते हुए कहा, ‘हम पढ़ते थे कि ‘ग’ से गणेश होता है, लेकिन आज बच्चों को ‘ग’ से गधा पढ़ाया जाता है। मैंने पूछा तो जवाब मिला कि, स्वामीजी आप नहीं जानते, गणेश सांप्रदायिक और गधा धर्मनिरपेक्ष है।’

इससे पहले वकीलों ने अवमानना अधिनियम पर चर्चा की। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा ने कहा कि अवमानना अधिनियम का उपयोग जजों को अपनी धौंस जमाने के लिए नहीं करना चाहिए। सही बात अगर जजों को शालीनता से बताई जाए तो इसे अवमानना करार नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जघन्य अपराधों में धारा 161 के तहत पुलिस द्वारा बयान लेने का प्रावधान खत्म किया जाना चाहिए।

केवल धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने बयान होने चाहिए जो ट्रायल में ही सामने रखे जाएं। बार काउंसिल यूपी के पूर्व अध्यक्ष अमरेंद्र नाथ सिंह, सदस्य श्रीनाथ त्रिपाठी, वरिष्ठ अधिवक्ता विनायक दीक्षित, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के महामंत्री डी. भरत कुमार ने भी विचार रखे।
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