डॉक्टर की सहानुभूति और मरीज से बोले गए दो अच्छे शब्द दवा का असर दोगुना कर देते हैं। इसके बावजूद डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान हर साल विद्यार्थी में सहानुभूति का स्तर कम होता जाता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हेल्थ साइंसेज एंड रिसर्च के हाल के अंक में प्रकाशित लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के अध्ययन में यह बात सामने आई है।
अध्ययन के दौरान देखा गया कि प्रथम वर्ष के छात्रों में सहानुभूति का औसत स्कोर 65.07 था। इंटर्नशिप तक इसका औसत स्कोर कम होकर 59.25 रह गया। इस तरह औसत स्कोर में करीब 10 फीसदी कमी आई। वहीं कुल औसत सहानुभूति स्कोर 63.17 रहा।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि छात्र और छात्राओं के कुल सहानुभूति स्कोर में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था। छात्रों का औसत स्कोर 62.93 और छात्राओं का 63.49 था।
अध्ययन में छात्रों के हालिया प्रोफेशनल परीक्षा के अंकों और सहानुभूति के बीच भी संबंध तलाशा गया। हालांकि, दोनों के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला। यानी अधिक अंक लाने वाला छात्र जरूरी नहीं कि अधिक संवेदनशील भी हो।
केजीएमयू प्रवक्ता प्रो. केके सिंह के अनुसार मेडिकल में दाखिला पाना बेहद कठिन होता है। दिन-रात पढ़ाई के बाद केजीएमयू जैसा संस्थान मिल पाता है। संस्थान में पढ़ाई के साथ ही ड्यूटी भी करनी पड़ती है। कई बार यह ड्यूटी 24 घंटे और इससे ज्यादा अवधि की भी हो जाती है। इस दौरान लगातार मरीजों से सामना और भी मानसिक तनाव देता है। इसके चलते भी सहानुभूति का स्तर कम हो सकता है। हालांकि उन्होंने माना कि सहानुभूति का स्तर बढ़ना चाहिए।