सरकारी तंत्र किस कदर संवेदनहीन हो सकता है, यह सीआरपीएफ के रिटायर्ड हवलदार रामेश्वर सिंह पर जो कुछ गुजरी उससे समझा जा सकता है। रामेश्वर सिंह की पत्नी को दिल की बीमारी थी।
एसजीपीजीआई ने इलाज पर 1.40 लाख रुपये का खर्च बताया। रामेश्वर सिंह ने सीआरपीएफ से मदद मांगी तो बताया गया कि महज 20 हजार रुपये मिलेंगे, वह भी ऑपरेशन के बाद, जबकि रामेश्वर सिंह 50 हजार रुपये की मदद के हकदार थे।
मदद के लिए वह दो साल तक भटकते रहे, इस दौरान इलाज का खर्च बढ़कर ढाई लाख हो गया। आखिरकार मदद नहीं मिली और उनकी पत्नी की मौत हो गई। अब रामेश्वर सिंह की ओर से दायर याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सीआरपीएफ को बतौर हर्जाना उन्हें 3 लाख रुपये देने का आदेश दिया है।
रामेश्वर की याचिका पर जस्टिस शबीहुल हसनैन और जस्टिस आदित्य नाथ मित्तल की खंडपीठ ने सीआरपीएफ को आदेश दिया कि वह उन्हें 50 हजार रुपये की सहायता और 50 हजार रुपये पत्नी के इलाज के लिए दे। लेकिन पत्नी की मौत पर उन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर की।
इस पर कोर्ट ने तीन लाख हर्जाना देने का आदेश दिया। सीआरपीएपफ को यह रकम रामेश्वर सिंह को एक महीने में देनी होगी। इस पर 2009 से 10 प्रतिशत की दर से ब्याज भी देना होगा। ऐसा नहीं कर पाने पर ब्याज की दर 12 प्रतिशत हो जाएगी। अदालत ने सीआरपीएफ अधिकारियों को मदद न देने और तथ्य छिपाने का भी दोषी माना।
बेटे को भी एडवांस चुकाने लायक नहीं समझा
रामेश्वर सिंह के पुत्र भी सीआरपीएफ में कार्यरत हैं। उन्होंने मां के इलाज के लिए एडवांस वेतन मांगा। जवाब मिला कि सीआरपीएफ को नहीं लगता वे एडवांस रकम चुकाने की क्षमता रखते हैं।
इस बीच रामेश्वर सिंह को पता चला कि उनके पेंशन पेमेंट ऑर्डर में हर महीने मेडिकल अलाउंस के 100 रुपये दिए जाते हैं, इसलिए वे सेंट्रल गर्वनमेंट हेल्थ स्कीम (सीजीएचएस) के तहत सुविधाएं भी नहीं ले सकते।
ऐसे में रामेश्वर सिंह ने आवेदन देकर पेंशन में मेडिकल अलाउंस न देने की दरख्वास्त दी। इस पर पेंशन विभाग ने 2008 में अलाउंस देना बंद किया।
कोर्ट ने कहा- महज 50 हजार से नहीं आंकी जा सकती जिंदगी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ‘पीड़ित ने 31 साल देश की सेवा की, लेकिन अपनी पत्नी के इलाज के लिए सीआरपीएफ से 5 साल तक भीख मांगता रहा।
सहायता मिलती तो उनकी पत्नी को बचाया जा सकता था। एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें प्राकृतिक आपदा पीड़ितों को 3 से 10 लाख रुपये तक की सहायता दे रही हैं, पड़ोसी देश व अपने देश के कुछ हिस्सों में आए भूकंप के बाद 7 लाख रुपये तक की सहायता दी गई।
ऐसे में सीआरपीएफ को भी रामेश्वर सिंह के मानसिक संत्रास, उत्पीड़न, दर्द, धोखे और एक जीवन को खोने के दुख की भरपाई करनी चाहिए। किसी व्यक्ति का जीवन मूल्य 50 हजार रुपये में नहीं आंका जा सकता।’
भीख मांगता रहा देश की सेवा करने वाला
कोर्ट ने कहा कि अगस्त 1999 में जारी विभागीय सूचना के अनुसार चिकित्सकीय जरूरत के लिए आर्थिक सहायता 20 हजार से बढ़ाकर 50 हजार रुपये की जा चुकी थी। लेकिन सीआरपीएफ यह तथ्य पूरे समय रामेश्वर सिंह और हाईकोर्ट से छिपाता रहा ।
कोर्ट में सीआरपीएफ ‘मेडिकल असिस्टेंस’ शब्द का उपयोग करता रहा, न कि ‘मेडिकल रिइंबर्समेंट’ का । साफ है कि सहायता इलाज के दौरान दी जानी चाहिए थी, न कि इलाज के बाद।
पीड़ित ने सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं। उनके बेटे को आर्थिक सहायता नहीं देने का तर्क भी समझ से परे और आधारहीन है। यह साबित करता है कि सिंह को गलत ढंग से सहायता से महरूम रखा गया।
पीड़ित हवलदार रामेश्वर सिंह ने पार्किंसन बीमारी की वजह से 1 दिसंबर 2003 को रिटायरमेंट ले लिया था। इसी दौरान उनकी पत्नी को हृदय संबंधी दिक्कत हुई।
एसजीपीजीआई में जांच हुई तो डॉक्टरों ने वॉल्व रिप्लेसमेंट की जरूरत बताई और खर्च 1.40 लाख खर्च बताया। रामेश्वर सिंह ने सीआरपीएफ से मदद मांगी, पर कोई जवाब नहीं मिला।
ऐसे में उन्होंने 2007 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने सीआरपीएफ को आवेदन पर जल्द निर्णय करने को कहा । सीआरपीएफ ने सिंह को बताया कि उन्हें पत्नी के इलाज के लिए मात्र 20 हजार रुपये मिल सकते हैं और वह भी इलाज के दस्तावेज कार्यालय में देने के बाद मिलेंगे।