हैदराबाद की आईटी कंपनी ‘अभी बस’ जाते-जाते परिवहन निगम को 4.38 करोड़ रुपये की चपत लगा गई।
अपुष्ट सूत्रों की माने तो चपत की रकम छह करोड़ तक हो सकती है। परिवहन निगम ने इस कार्यदायी कंपनी को वॉल्वो सेवा के लिए ऑनलाइन टिकट बुक करने की जिम्मेदारी सौंपी थी।
इस कंपनी ने टिकट कलेक्शन की पूरी रकम निगम के खाते में जमा नहीं की। कंपनी का इसी साल फरवरी में अनुबंध खत्म हो गया तो उसने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया और निगम के आला अफसर हाथ मलते रह गए।
निगम की तरफ से संचालन इकाई ने 4 फरवरी 2009 में आईटी कंपनी मेसर्स ‘अभी बस’ से अनुबंध किया था।
सूत्र बताते हैं कि कंपनी ने 3 फरवरी 12 तक देश भर में 10 करोड़ 67 लाख 19 हजार दो रुपये टिकट कलेक्शन के रूप में कलेक्ट किए।
कंपनी ने इस रकम में से 4 करोड़ 93 हजार 588 रुपये ही निगम के खाते में जमा किए। दस्तावेजों के मुताबिक ‘अभी बस’ का जिस वक्त अनुबंध खत्म हुआ।
उस दौरान कंपनी पर 5 करोड़ 45 लाख 43 हजार 697 रुपये की देनदारी थी। यह वह रकम है जो टिकट कलेक्शन करने के बाद निगम खाते में जमा कराने के बजाए दूसरे खाते में जमा करा दी गई।
ब्याज से कमाई का खेल
मेसर्स ‘अभी बस’ ने शुरू से ही टिकट कलेक्शन की रकम निगम के खाते में जमा करने लापरवाही की। लेकिन जिस क्षेत्रीय प्रबंधक (आरएम) एवं सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक (वित्त) को इसकी मॉनीटरिंग सौंपी गई थी उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
दरअसल इसके पीछे निगम की रकम को अन्य खातों में जमा कर ब्याज कमाने का खेल था। इसमें कुछ बड़े अफसरों की साठगांठ के चलते ही ‘अभी बस’ कंपनी पर वसूली के लिए शिकंजा नहीं कसा गया जिससे टिकट कलेक्शन की रकम का ग्राफ धीरे-धीरे ऊपर बढ़ता गया।
रिटायर अफसर के हाथ कमान
निगम ने जिस ‘अभी बस’ कंपनी को ऑनलाइन टिकट बेचने की जिम्मेदारी सौंपी थी उसे काम दिलाने में एक रिटायर अफसर की मुख्य भूमिका थी।
पर्दे के पीछे ‘अभी बस’ के संचालन की कमान उसी के हाथ में ही थी। इस रिटायर अफसर के हस्तक्षेप और प्रभाव के चलते ही अफसर जमा की गई रकम निगम के खाते में स्थानांतरित करने में छूट देते रहे।