जो भाषा हम सामान्य बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं, उसमें 90 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। घर आने वाले मेहमानों के अभिवादन से लेकर जिन सम्बंधों को हम निभाते हैं, वह हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं।
हर गतिविधि का वर्णन शास्त्रों में है, जो संस्कृत में लिखे हुए हैं। कुल मिलाकर हमारे जीवन में संस्कृत शामिल रहती है। इसे समझने की जरूरत है। लोगों को संस्कृत के इसी महत्व को समझाने के लिए ‘गृहं गृहं प्रति संस्कृतम’ यानी घर-घर संस्कृत पहुंचाने का अभियान राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान मानित विश्वविद्यालय व संस्कृत भारती संस्था की ओर से शुरू किया गया है।
अभियान रविवार को विश्वविद्यालय में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ध्वाजारोहण से करेंगे। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान मानित विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पवन दीक्षित ने बताया कि संस्कृत देवों की भाषा यूं ही नहीं मानी जाती रही है।
वेद-पुराण, शास्त्र संस्कृत में ही लिखे गए हैं। संस्कृत में ही समाज, विज्ञान, अर्थशास्त्र और ऐसे ही कई विषयों की जानकारियां हैं। चूंकि, संस्कृत रोजगार की भाषा भी बन रही है। इसलिए लोगों का संस्कृत से आसान परिचय कराने की तैयारी की गई है।
राज्यों की भाषा में होगी किताब
इसके तहत देशभर में पांच लाख पुस्तिकाएं बांटी जाएंगी। ये पुस्तिकाएं पतली-पतली होंगी, जिसमें सामान्य अभिवादन से लेकर घर पर इस्तेमाल किए जाने वाले वाक्य होंगे। जैसे, आप क्या कर रहे हैं?
कहां जा रहे हैं? आपकी तबियत कैसी है। रविवार को अभियान का शुभारम्भ देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। इस अवसर पर कुलपति प्रो. पीएन शास्त्री, लखनऊ विश्वविद्यालय कुलपति डॉ. एसबी निमसे सहित संस्कृत अनुरागी व वास्तुवेत्ता शामिल होंगे।
घर-घर जाकर लोगों को जो संस्कृत की पुस्तिकाएं बांटी जाएंगी, वे भाषा में होंगी। यानी उत्तर भारत के हिन्दी भाषी राज्यों में बंटने वाली पुस्तिका की भाषा हिन्दी, इंग्लिश व संस्कृत में होगी जबकि, ऐसे ही दक्षिण व अन्य राज्यों में संस्कृत व इंग्लिश के अतिरिक्त वहां की बोलचाल की भाषा प्रयोग की गई है।