केरल के मीनाक्षीपुरम में 1980 के आसपास धर्म परिवर्तन की बड़ी घटना से पहले भी देश भर में कई जगह छोटे स्तर पर हिंदुओं, खासतौर से अनुसूचित जाति और गरीबों के धर्मान्तरण की घटनाएं घट रही थीं। यह वही दौर था कि जब दोहरी सदस्यता का सवाल उठाकर जनसंघ के लोगों को जनता पार्टी से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया गया था।
संघ ने धर्मान्तरण के खिलाफ अभियान शुरू करने के साथ अपने वरिष्ठ प्रचारकों मोरोपंत पिंगले और ओंकार भावे को हिंदुत्व के जनजागरण की योजना का काम सौंपा। इसी बीच, जनता पार्टी की घटना ने भी संघ परिवार को सोचने पर मजबूर कर दिया। तय हुआ कि हिंदुत्व की चेतना पैदा किए बगैर हिंदुओं को राजनीति में सम्मान मिलना मुश्किल है। इन लोगों ने धर्म और अध्यात्म पर अधिकारपूर्वक तथ्यों व तर्कों के साथ बात रखने वाले महेश नारायण सिंह को इसकी जिमेदारी सौंपी।
उपहास के बावजूद अभियान में जुटे रहे
महेश नारायण सिंह फैजाबाद स्टेशन पर उतरकर अपने मित्र और वहां के प्रतिष्ठित वकील समर बहादुर सिंह के घर पहुंचे और तीन दिन वहां रहकर संतों से संपर्क व संवाद किया। अपना मकसद बताया। चौथे दिन उन्हें सुग्रीव किला पीठाधीश्वर पुरुषोत्तमाचार्य ने अपने यहां गोशाला में रहने का स्थान उपलब्ध कराया। इसके बाद महेश श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की बात कहते हुए लोगों से समर्थन मांगने लगे। महेश नारायण सिंह के भतीजे कौशलेंद्र सिंह बताते हैं, चाचाजी (महेश नारायण) ने एक दिन इस मद्दे पर रणनीति तय करने के लिए सुग्रीव किला पर बैठक बुलाई तो बमुश्किल पांच लोग ही आए। इनमें पुरुषोत्तमाचार्य के साथ समर बहादुर सिंह भी थे। इसी बैठक में सबसे पहले औपचारिक तौर पर मंदिर मुक्ति के आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। महेश जब इस प्रस्ताव पर समर्थन मांगने के लिए लोगों से मिले तो उनकी फिर हंसी उड़ाई गई। पर, वह अपने अभियान में जुटे रहे।
बजरंग दल की स्थापना
आखिरकार महेश नारायण का प्रयास रंग लाया। उन्हें संतों का समर्थन मिलने लगा। महेश ने अयोध्या में संगठन विस्तार की योजना बनाई और फकीरे राम मंदिर में विश्व हिंदू परिषद का कार्यालय खुलवाया। कौशलेंद्र सिंह कहते हैं, इस आंदोलन से युवाओं को जोड़ने की चाचाजी (महेश नारायण) की कल्पना को साकार करने के लिए फकीरे राम मंदिर में अशोक सिंघल व ओंकार भावे के नेतृत्व में 1983 में बजरंग दल की स्थापना की योजना बनी। बाद में इसका औपचारिक रूप से गठन कर संघ के प्रचारक विनय कटियार को बजरंग दल का राष्ट्रीय संयोजक बनाकर सुग्रीव किला पर उसका कार्यालय खुलवाया गया। अब महेश नारायण की नजर श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर संगठन की गतिविधियां बढ़ाने पर थीं। इसके लिए वह जमीन तलाश रहे थे। उनके प्रयासों से संबंधित स्थल पर श्रीराम की मूर्ति स्थापना में शामिल रहे बाबा अभिराम दास के शिष्य रामकेवल दास ने श्रीराम जन्मभूमि के पास स्थित अपनी 2.77 एकड़ जमीन विहिप के नाम कर दी। इसके बाद महेश नारायण ने इस जमीन पर लगे पीएसी कैंप को हटाकर यहां स्थित टिन शेड में ही अपना ठीहा जमाया और रणनीति पर आगे काम शुरू कर दिया।
शुरू हुआ हिंदुत्ववादी चेहरों का एकीकरण अभियान
अब महेश नारायण की नजर अयोध्या के आसपास के उन हिंदुत्ववादी चेहरों को एकजुट करके इस अभियान में लगाने पर थी जो अपने-अपने इलाके में राजनीतिक समीकरणों की भी दिशा तय करते थे। इसी के तहत उन्होंने गोरखपुर पीठ के तत्कालीन महंत अवेद्यनाथ से संपर्क साधा और वहां अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मुक्ति के मुद्दे पर बैठक कराई। इसमें अमेठी के राजा रणंजय सिंह सहित अन्य कई प्रमुख चेहरे शामिल हुए। फिर अयोध्या में बैठक हुई और आंदोलन की दिशा तय हो गई।