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सूरत-ए-हालः प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम

Mon, 18 Nov 2019 02:43 AM IST
दुष्यंत शर्मा महेंद्र तिवारी, लखनऊ
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : YouTube
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एक समय था जब प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के आसपास हुआ करती थी। लेकिन, जैसे-जैसे समय बीता प्रदेश की चुनौतियां बढ़ती गईं। आज हालात ये हैं कि प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम पर अटकी हुई है।

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प्रदेश सरकार ने हाल में 15 वें वित्त आयोग के सामने प्रदेश की चुनौतियों की तस्वीर पेश की। इसमें यह कड़वी सच्चाई सामने आई है। आंकड़ों के मुताबिक आजादी के बाद 1950-51 में प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के लगभग बराबर थी। प्रचलित भावों पर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय जहां 259 रुपये थी, राष्ट्रीय स्तर पर यह 267 रुपये थी। केवल तीन प्रतिशत का अंतर था। 

लेकिन इसके बाद हर दशक में यह अंतर बढ़ता गया। 2018-19 में यह अंतर 49.1 प्रतिशत पहुंच गया है। इन समस्याओं के पीछे प्रदेश की कठिन परिस्थितियां व लंबे अर्से तक  फोकस सेक्टर तय कर काम न होना मुख्य वजह मानी जा रही है। बड़ी संख्या में बेरोजगारी भी इसकी बड़ी वजह है।
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शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि प्रदेश सरकार ने इन चुनौतियों से पार पाने के लिए ही अगले पांच वर्षों में 10 खरब डालर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य किया है। इसके लिए फोकस सेक्टर तय कर अलग-अलग काम शुरू किए गए हैं। 

मसलन, किसानों की आय दोगुना करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं तो हर गरीब को आवास, बिजली और पानी पहुंचाने केसाथ इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास और औद्योगीकरण के प्रयास शामिल हैं। आयोग से शुरू किए गए प्रयासों को पूरी रफ्तार से जारी रखने के लिए चुनौतियों को ध्यान में रखकर प्रदेश की सहायता बढ़ाने की मांग रखी गई है।

  प्रति व्यक्ति आय रुपये में (प्रचलित दरों पर)
वर्ष                     यूपी                राष्ट्रीय     अंतर (प्रतिशत में)
1950-51        259                267                3
1960-61        252                306                18
1970-71        486                633                23
1980-81        1278            1630                21
1990-91        3590             4983                28
2000-01        9828             16688            41.1
2010-11        26698            54051            50.06
2018-19        64330            126406            49.1

प्रदेश की मुख्य चुनौतियां 
- ग्रामीण क्षेत्र में अधिकतम जनसंख्या
- करीब 65 प्रतिशत लोगों की कृषि पर निर्भरता
- प्रदेश में छोटी-छोटी जोतें
- खनिजों संपदाओं की कमी
- भूमिगत जल स्तर का निम्न होना
- प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र सूखा और बंजर ग्रस्त
- पूर्वांचल में बाढ़ की अधिकता
- मानव विकास सूचकांक में नीचे
- जनसंख्या घनत्व अधिक होना

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सुधार की ठोस पहल न होने से बने ये हालात: प्रो. मनोज

अर्थशास्त्री प्रो. मनोज अग्रवाल कहते हैं कि दो वर्ष 1952-53 व 1953- 54 ऐसे भी थे, जब यूपी की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से अधिक थी। लेकिन, इस स्थिति को बनाए रखने और उसमें सुधार को लेकर ठोस काम नहीं हुए।

मसलन, अन्य राज्यों की अपेक्षा औद्योगीकरण पर फोकस नहीं हुआ। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर ध्यान नहीं दिया गया। कृषि विकास में केवल खाद्यान्न उत्पादन पर फोकस किया गया जिसमें किसानों की समृद्धि मूल में थी ही नहीं। उत्पादन बढ़ा लेकिन भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने से खाद्यान्न की बर्बादी आज तक जारी है। यह घाटा किसानों के हिस्से में गया।

नकदी फसल केवल गन्ना है, जो बड़े किसानों तक सीमित है। आलू घाटे का सौदा साबित हो रहा है। छोटे किसानों को आगे बढ़ाने पर फोकस नहीं रहा। इसके अलावा कानून-व्यवस्था अच्छी न होने से निवेशकों ने रुचि नहीं दिखाई।

इससे बेरोजगारी बड़ी चुनौती बनी हुई है। जब कमाने वाली बड़ी आबादी खाली हाथ होगी तो औसत आय पर असर पड़ना लाजिमी है। इस स्थिति में सुधार के लिए सभी मोर्चों पर मजबूती से और सतत रूप से काम करने की जरूरत है। तभी इस स्थिति में सुधार संभव है।

आयोग से संसाधन की मांग
आम लोगों के सशक्तीकरण से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के लिए     1,02,138 करोड़ 
ग्रामीण व शहरी निकायों के लिए                                         4,35,090 करोड़
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