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कैराना मामले पर संतों की कमेटी ने खोली अखिलेश सरकार की पोल

Tue, 21 Jun 2016 02:10 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : amar ujala
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कैराना में संप्रदाय विशेष के दबाव में पलायन के मुद्दे पर प्रदेश सरकार की घेराबंदी करने में भाजपा की रणनीति भले ही पूरी तरह सफल नहीं रही हो, लेकिन कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर सूबे की हुकूमत को चेतावनी जरूर मिल गई है।
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भाजपा के बाद संतों के दल ने भी माना है कि वहां अपराधी निरंकुश हैं। संतों की अगुवाई करने वाले कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम का कहना है कि 23 जून को मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपते समय अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आग्रह किया जाएगा।

मुजफ्फरनगर दंगे से वोटों का ध्रुवीकरण कराकर लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक कामयाबी हासिल करने वाली भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले हिंदुओं के पलायन को बड़ा मुद्दा बनाया। दंगा प्रभावित शामली जिले के कैराना कस्बे को इसकी शुरुआत के लिए चुना गया।
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पूरा होमवर्क किए बिना ही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अमित शाह ने कैराना से पलायन को मुद्दा बनाने का एलान कर दिया। सांसद हुकुम सिंह ने जब पलायन करने वालों की सूची जारी तो भाजपा को लगा कि वह कैराना से यह संदेश में सफल रहेगी कि एक धर्म विशेष से जुड़े लोगों के दबाव में कैराना से हिंदुओं का पलायन हो रहा है।

ओवैसी के अलावा किसी ने नहीं की बयानबाजी

असदुद्दीन ओवैसी
भाजपा नेताओं ने अति उत्साह में इसे कश्मीर से हिंदुओं के पलायन से जोड़ दिया। उसे उम्मीद थी कि मुजफ्फरनगर, शामली के कई गांवों से मुस्लिमों के पलायन का मुद्दा उठेगा। चूंकि पश्चिमी यूपी में कैराना जैसे मुस्लिम बहुल कस्बे हर जिले में हैं, इसलिए सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण आसानी से हो जाएगा, लेकिन एआईएमआईएम के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के अलावा किसी मुस्लिम नेता ने भाजपा के जवाब में मुसलमानों के पलायन को लेकर बयानबाजी नहीं की।

ओवैसी ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद 50 हजार मुसलमानों के पलायन का दावा किया है लेकिन स्थानीय मुस्लिम लीडरशिप ने इसे तवज्जो नहीं दी।

भाजपा की रणनीति को पहला झटका उसके बैकफुट पर आ जाने से ही लग गया। भाजपा की टीम ने सांप्रदायिक के बजाय अपराधियों के दबाव में पलयान का तर्क दिया। चूंकि सूची में तमाम नाम बिना प्रामाणिक जानकारी के जोड़ दिए गए थे, इसलिए भी भाजपा प्रदेश सरकार की घेराबंदी करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई, लेकिन पश्चिमी यूपी में कानून-व्यवस्था का मुद्दा जरूर चर्चा में आ गया।

भाजपा का दावा, राजनीतिक दबाव के कारण काम नहीं कर पाती पुलिस

निसंदेह, कैराना में कुछ घटनाओं ने अपराधियों के बेखौफ हौसलों का संदेश दिया। कारण जो भी रहा हो, आम लोगों, खास तौर पर व्यापारी वर्ग को भयमुक्त रहने का भरोसा देने में पुलिस नाकाम रही।

भाजपा के दल ने कहा है कि पुलिस राजनीतिक दबाव में अपराधियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाती है। पलायन की मुख्य वजह यही है।

सपा की ओर से गठित संतों की कमेटी रविवार को कैराना गई तो कानून-व्यवस्था की बदहाली उसके सामने भी आई। आचार्य प्रमोद कृष्णम ने बताया कि एक भी व्यक्ति ने नहीं कहा कि मुसलमानों के दबाव में किसी हिंदू ने घर छोड़ा है। हां, अपराधियों के निरंकुश होने की शिकायत जरूर मिली।

इस मुद्दे पर संत मुख्यमंत्री से मिलकर अपराधियों पर प्रभावी नियंत्रण का आग्रह करेंगे। संतों की इस साफगोई से प्रदेश सरकार को कानून-व्यवस्था पर चेतावनी मिल गई है। चुनावी साल में सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। अन्यथा, छिटपुट घटनाओं को बड़ा रूप देकर सरकार की घेराबंदी होती रहेगी।
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पश्चिमी यूपी में अकेला नहीं है कैराना

- फोटो : amar ujala
पश्चिमी यूपी में भाजपा के एजेंडे में अकेला कैराना नहीं है। हर जिले में ‘कैराना’ हैं। कांधला के बाद देवबंद से शुरू हुआ सिलसिला दो दर्जन से ज्यादा कस्बों तक पहुंच सकता है। भाजपा उन सभी कस्बों से ठिकाना बदलने वाले का उदाहरण दे सकती है जिनमें मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत ज्यादा है।

फर्क बस इतना है कि कैराना हरियाणा बॉर्डर से सटा हुआ, सामाजिक तौर पर पिछड़ा हुआ कस्बा है। सीमावर्ती स्थानों पर व्यवस्था की खामियों के चलते कुछ बुराइयां आ जाती हैं। कैराना और आसपास का इलाका भी उनसे दो-चार हो रहा है।

पांच-सात किमी चलकर ही हरियाणा से सस्ता पेट्रोल, डीजल वहां आसानी से आ जाता है, इसलिए पेट्रोल पंप का संचालन लाभ का धंधा नहीं है। शराब, नशीले पदार्थों की खेप भी हरियाणा बॉर्डर से आसानी से आ जाती है। एक राज्य में अपराध करके क्रिमिनल दूसरे राज्य में पनाह ले सकता है। बाकी कस्बों में ये हालात नहीं हैं।

पलायन से ज्यादा चिंता गन्ना मूल्य भुगतान की
भले ही कैराना से पलायन के मुद्दे पर टीवी चैनलों पर बहस हुई हो, इसकी तुलना कश्मीर से कर दी गई हो लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आसपास के गांवों में इसकी खास हलचल नहीं है। वहां पलायन नहीं, गन्ना मूल्य भुगतान की चिंता ज्यादा है। जिस शामली जिले में कैराना पड़ता है, उसके किसानों का 300 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य चीनी मिलों पर बकाया है।
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