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UP : नतीजे तय करेंगे सियासत की दिशा; भाजपा, सपा और कांग्रेस के साथ ही बसपा के प्रयोगों का भी होगा परीक्षण

Tue, 04 Jun 2024 04:42 AM IST
दुष्यंत शर्मा महेंद्र तिवारी, लखनऊ

सार

ये नतीजे सिर्फ यही नहीं बताएंगे कि देश में सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीट वाले राज्य में किस गठबंधन को कितनी सीटें मिलीं, ये संदेश भी देंगे कि भाजपा से लेकर सपा और कांग्रेस से लेकर बसपा आगे किस दिशा में जाने वाली हैं।
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यूपी में लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें हैं। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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18वीं लोकसभा चुनाव के नतीजे मंगलवार को आ जाएंगे। ये नतीजे सिर्फ यही नहीं बताएंगे कि देश में सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीट वाले राज्य में किस गठबंधन को कितनी सीटें मिलीं, ये संदेश भी देंगे कि भाजपा से लेकर सपा और कांग्रेस से लेकर बसपा आगे किस दिशा में जाने वाली हैं।

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ये नतीजे यह भी बताएंगे कि भाजपा का छोटे दलों के साथ समझौते की नीति लगातार कारगर रही या कांग्रेस-सपा गठबंधन की गांठ मजबूत हुई। बसपा की एकला चलो रणनीति की थाह भी ये नतीजे लेंगे। ढाई माह से ज्यादा लंबे चुनाव अभियान में मतदाताओं के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से तमाम मुद्दे उठे, नैरेटिव गढ़े गए। चुनाव नतीजे बताएंगे कि यूपी की जनता में सत्ता पक्ष की गारंटी पर भरोसा कायम है या विपक्ष के वादों पर भरोसा किया है। उसे डबल इंजन सरकार का फायदा अच्छा लगा या केंद्र व राज्य में अलग-अलग सरकार देखने का मन बना लिया है। यूपी की 80 सीटों पर केंद्र का बड़ा दारोमदार है।

भाजपा : लगातार पांचवीं बड़ी जीत या सबक और संदेश
2014 के लोकसभा चुनाव से भाजपा यूपी में लगातार बड़ी जीत हासिल कर रही है। समाजवादी पार्टी के सत्ता में रहते 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा दोनों ही चुनाव बड़े अंतर से जीती। इसी तरह केंद्र व राज्य में भाजपा सरकार होने के बाद 2019 में लोकसभा और 2022 में विधानसभा चुनाव हुए। दोनों ही चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की। योगी सरकार के दोबारा सत्ता में आने और राम मंदिर बनने के बाद यह पहला चुनाव है। भाजपा ने इस चुनाव को जीतने के लिए हर संभव रणनीति को आजमाया। पिछले चुनावों में कारगर साबित हुई लाभार्थीपरक योजनाओं को अगले पांच साल के लिए या तो बढ़ाया है या उनकी संख्या में इजाफा किया है। छोटे दलों से गठबंधन के सफल प्रयोग को तो आगे बढ़ाया ही है। 

  • फायदेमंद साबित होने की उम्मीद में कई धुर विरोधी नेताओं को ऐन चुनाव के बीच शामिल किया है। ये नतीजे बताएंगे कि जनता को भाजपा के ये प्रयोग पसंद आए या नहीं। नतीजे यह भी बताएंगे कि योगी सरकार की माफिया के खिलाफ कार्रवाई जनता को अब भी भा रही है या उसमें कोई मीन-मेख तलाश रही है। 
  • जनता का भाजपा के राममंदिर, राष्ट्रवाद, लाभार्थी समर्थक नीतियों और 2047 के लिए उम्मीद बंधाने वाले मुद्दों पर समर्थन जारी है या वह संविधान, जातीय जनगणना, महंगाई और बेरोजगारी से जुड़े विपक्षी वादों पर वह बलिहारी है। भाजपा को लगातार पांचवीं जीत उम्मीद के हिसाब से मिलती है, तो वह इन्हीं प्रयोगों पर बढ़ना चाहेगी। वरना, उसे अपनी रणनीति पर नए सिरे से गौर करना होगा।

बसपा : फिर से सोचना पड़ेगा-किसी के साथ चलें या अकेले

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18वीं लोकसभा चुनाव के नतीजे बसपा के लिए कई मायने में अहम होंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा का गठबंधन था। सपा को पांच और बसपा को 10 सीटें मिली थीं। बसपा ने तब आरोप लगाया था कि उसे सपा के वोट ट्रांसफर नहीं हुए। 

  • इस चुनाव में बसपा अकेले मैदान में आई। सभी 80 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। चुनाव में मिलने वाली सीटें बताएंगी कि उसका एकला चलो का फैसला सही साबित हुआ या गलत। यदि इस चुनाव में बसपा उम्मीद के हिसाब से सीटें हासिल करने में विफल रही, तो उसे अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। 
  • यदि बसपा का खाता नहीं खुला, तो यूपी की विधान परिषद और राज्यसभा के बाद लोकसभा में भी पार्टी की नुमाइंदगी नहीं रह जाएगी। विधानसभा में भी एक ही विधायक है।

सपा : पता चलेगा कि बार-बार गठबंधन के साथी बदलने की रणनीति कितनी कारगर रही
समाजवादी पार्टी 2017 में कांग्रेस से गठबंधन कर विधानसभा का चुनाव लड़ी। पार्टी सत्ता नहीं बचा पाई। 2019 में पार्टी ने बसपा व रालोद से गठबंधन किया। गठबंधन से कोई खास फायदा नहीं मिला। 2014 के लोकसभा चुनाव के बराबर पांच सीटें ही बनी रहीं। 

  • 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस व बसपा से जैसी बड़ी पार्टियों की जगह रालोद व अन्य छोटे दलों के साथ चुनाव लड़ा। पार्टी सत्ता में तो नहीं आ पाई लेकिन सीटें कुछ बढ़ गईं। इस लोकसभा चुनाव में सपा फिर कांग्रेस के साथ गठबंधन कर मैदान में है। पार्टी बड़ी सफलता के दावे कर रही है। यदि उसे अपेक्षा के हिसाब से सीटें नहीं मिलीं, तो उसे अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। उम्मीद के हिसाब से सीटें मिलीं तो यह गठबंधन आगे बढ़ सकता है।

कांग्रेस : दलित वोटरों पर रहेगी नजर
केंद्र में सत्ता के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस यूपी में सपा के साथ गठबंधन कर मैदान में आई। प्रदेश की 80 सीटों में से रायबरेली और अमेठी सहित 17 सीटों पर चुनाव लड़ी। पार्टी की वर्तमान में एक सीट है। इस चुनाव में वह कितनी सीटें पाएगी, यह तो महत्वपूर्ण है ही, सपा से गठबंधन कर वह वोट शेयर कितना बढ़ा पाई है, उससे भी ज्यादा  महत्वपूर्ण है। इस चुनाव में कांग्रेस ने सपा के साथ रहकर अल्पसंख्यक और दलित वोटों को अपनी ओर खींचने पर फोकस किया। सभी की इसपर नजरें होंगी कि कांग्रेस के साथ मुस्लिम और दलित मतदाता कितनी संख्या में जुड़े। कांग्रेस यदि वोट शेयर व अपनी कुछ सीटें बढ़ा पाती है, तो उसके लिए यह बड़ी उपलब्धि होगी।

छोटे दलों का बड़ा कमाल   अब भी कायम है या नहीं
यूपी में भाजपा बड़ी पार्टियों से गठबंधन करने की जगह छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने की रणनीति पर बढ़ी है। इस लोकसभा चुनाव में सुभासपा, निषाद पार्टी, रालोद व अपना दल सरीखे दलों के प्रदर्शन पर भी निगाहें हैं। ये सभी दल भाजपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ रहे हैं।

  • पिछले कई बार से भाजपा के समर्थन में मानी जाने वाली कुर्मी, निषाद, जाट, पासी जैसी कई जातियों के मतदाता इस बार कई सीटों पर दूसरे दलों की ओर रुख करते नजर आए हैं। जाति विशेष में प्रभाव रखने वाली ये पार्टियां अपनी जाति के मतदाताओं को अपने गठबंधन के पक्ष में कितना लामबंद करने में सफल रहीं, नतीजों से इसका भी पता चलेगा।
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