रामायणकालीन ऋषि मांडव्य के तप से उत्पन्न हुई पौराणिक तमसा नदी की तस्वीर बदल गई। बारिश के बाद यह पानी से लहलहा रही है। तमसा के जीर्णोद्धार से कई लाभ हुए। जिले के मजदूरों को लगभग चार लाख मानव दिवस का रोजगार मिला तो 151 किमी लंबी तमसा के तट के हजारों एकड़ फसल की सिंचाई का मार्ग भी प्रशस्त हो गया। हजारों तालाबों की खुदाई के बराबर जल संचयन और भू-गर्भ जल रिचार्ज का बड़ा श्रोत बन गई तमसा। अब तमसा को सदा नीरा बनाने के लिए कल्याणी नदी से मिलन कराने की तैयारी है। शायद दो नदियों के मिलन का यह प्रदेश का पहला प्रोजेक्ट होगा।
तमसा के जीर्णोद्धार के लिए भगीरथ प्रयास जनवरी 2019 में शुरू हुआ था। तत्कालीन डीएम डॉ. अनिल पाठक, सीडीओ अभिषेक आनंद और डीसी मनरेगा नागेंद्र मोहन राम त्रिपाठी ने इसकी शुरूआत कराई। तब कम ही लोगों का विश्वास था कि इतनी बड़ी नदी को भी जीवन दान मिल सकता है लेकिन मजदूरों की कठिन मेहनत से इसका स्वरूप बदल गया। जहां झाड़-झंखाड़ थे वहां बारिश का पानी हिलोरे ले रहा है। शायद लोगों के लाभ के साथ ही इसको उत्पन्न करने वाले ऋषि मांडव्य की आत्मा भी यह देखकर संतुष्ट हो रही होगा। तमसा मवई के बसौढ़ी से निकलकर लगभग 151 किमी चलकर मयाबाजार के बेनवा के बाद अंबेडकरनगर जिले में प्रवेश कर जाती है।
लगभग 180 दिन में परियोजना का लगभग 80 फीसदी काम पूरा हो गया। मनरेगा और राज्य वित्त से 24 करोड़ रूपये की इस परियोजना में अब तक खर्च कितना हुआ, इसे तो अब तक नहीं कंपाइल किया गया लेकिन मजदूरों के हिस्से में सात करोड़ रुपये जरूर आ गए। इस ऐतिहासिक नदी के जीर्णोद्धार से जिले में हजारों तालाब के बराबर जल संचयन का मार्ग प्रशस्त हो गया। इसके साथ ही तमसा वाटर रिचार्ज का बड़ा कारक बन गई।
डेढ़ से पांच मीटर तक की गई खोदाई
पौराणिक तमसा को नवजीवन देने के लिए डेढ़ से पांच मीटर तक की खोदाई की गई है। लुप्त प्राय हुई तमसा को वजूद में लाने के लिए मवई और रुदौली में चिन्हांकन के बाद चार से पांच मीटर की खोदाई की गई। इसके आगे बढने पर अमानीगंज, मिल्कीपुर, सोहावल, मसौधा, बीकापुर, तारून आदि ब्लाक क्षेत्र के गांवों में अस्तित्व में रही तमसा के जीर्णोद्धार के लिए एक से दो मीटर खोदना पड़ा।
कुल लगभग 145 किमी में की गई खोदाई
जिले में 151 किमी लंबी तमसा में से लगभग 145 किमी की खोदाई की गई। हालांकि, अच्छी बात यह रही कि जहां नदी लगभग लुप्तप्राय हो गई थी, खोदाई वहीं पहले कराई गई। जहां अब तक खोदाई नहीं हो पाई है, वहां पहले से अस्तित्व में यह मौजूद है। खोदाई के पहले बारिश में तमसा जल फैलाव बहुत अधिक होता था लेकिन अब खोदाई के बाद बारिश का ज्यादा पानी इसके पेंदी में सिमट जाने से पहले जैसा फैलाव नहीं और फसलें डूबने से बच जाएंगी।
40 मीटर चौड़ी नदी रह गई 10 मीटर में
तमसा अमूमन पूरे जिले में लगभग 35 से 40 मीटर के फैलाव में खोदी गई लेकिन मवी के बरौली जैसे कुछ स्थान ऐसे हैं जहां नदी को महज दस मीटर में फैलाव मिल सका। इसका कारण दोनों ओर पक्के मकान का निर्माण होना है।
विभाग सक्रिय होते तो और बेहतर होती स्थिति
मनरेगा की इस बड़ी परियोजना को लेकर विभाग सक्रिय होते तो स्थिति और बेहतर होती। चाहे राजस्व मकमा हो या फिर लोक निर्माण विभाग समय पर अपेक्षित कार्य न होने के कारण नदी पर पड़ने वाले पांच बड़ी पुलियों का स्टीमेट समय पर नहीं भेजक सका तो कई स्थानों पर तहसील प्रशासन की हीलाहवाली से काम महीनों बाधित रहा। फिलहाल छोटी पुलिया से जल निकासी न होने पर ज्यादा बारिश में कुछ स्थानों पर बाढ़ की स्थिति बन सकती है।
दो नदियों को आपस में जोड़ने की तैयारी
प्रदेश में यह शायद अपने आप में ऐसा पहला मामला होगा कि दो नदियों को आपस में जोड़कर सदा नीरा बनाए जाने का प्रयास है। अब तमसा को कल्याणी से जोड़कर इसे साकार किया जाने के काम पर शुरूआत की गई है। साथ ही तमसा में चेकडैम बनाकर निर्धारित ऊंचाई तक पानी रोकने की परियोजना भी है।
उपायुक्त मनरेगा नागेंद्र मोहन राम त्रिपाठी ने बताया कि तमसा के जीर्णोद्धार का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। इसे कल्याणी से जोड़कर सदा नीरा बनाए जाने की कोशिश है। साथ ही तमसा के तट पर दो लाख पौधे रोपित करके हरा भरा बनाया जाएगा। नदीं में एक स्तर तक पानी रोकने के लिए जगह-जगह चेकडैम बनाया जाएगा।