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देखिए, किस तरह जी रहा है बुंदेलखंड का किसान

Mon, 08 Feb 2016 02:32 AM IST
शिशिर द्विवेदी/अमर उजाला, झांसी
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यह बुंदेलों की धरती है। पर, कहीं किसान खुदकुशी कर रहा है तो कहीं बदहाली के आंसू रो रहा... लेकिन, नेताओं के लिए यह सियासत की जमीन है।
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फसल लहलहाये या नहीं, सियासत की फसल खूब फल-फूल रही है। फसलों की हालत देख किसान सदमे में हैं, खुदकुशी कर रहा है, पर जिम्मेदार बेखबर हैं। राहत के नाम पर कुछ हो रहा है तो सिर्फ प्रायोजित हंगामा।

कभी कांग्रेस के युवराज पदयात्रा करते हैं तो कभी राज्य और केंद्र सरकारें बुंदेलखंड की बदहाली के लिए एक -दूसरे पर ठीकरा फोड़ती हैं।

... और बेहाल किसानों की कड़वी हकीकत इसी से समझी जा सकती है, जब बांदा के नौगवां के किसान आशाराम की विधवा चंपा सूनी आंखों से कहती है, 'दुई मूठी पिसान होत तो न निकरते उनके प्रान।' यही कहानी है बुंदेलखंड के सात जिलों झांसी, ललितपुर, बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर व जालौन के किसानों की।
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करीब 122 किसानों ने की आत्महत्या

बुंदेलखंड में किसानों के लिए काम करने वाली संस्थाओं की मानें तो मार्च 2015 से जनवरी 2016 तक करीब 122 किसानों ने आत्महत्या कर ली या फिर फसल बर्बादी के सदमे ने उनकी जान ले ली।

किसान बीते आठ साल में चार सूखों व ओलावृष्टि का सामना कर चुके हैं, पर पानी के अभाव में पिछली खरीफ फसल की बर्बादी और अब रबी की 90 फीसदी फसल की बोआई न होने से उनकी कमर ही टूट गई है।

ऊपर से बैंकों व साहूकारों के कर्ज वसूली का दबाव ऐसा कि उन्हें मौत के अलावा और कोई राह दिख रही।

क्या कहते हैं यूपी के मुख्य सचिव

इस पर यूपी के मुख्य सचिव आलोक रंजन का कहना है ‘बुंदेलखंड की विषम स्थिति को लेकर सरकार बेहद संवेदनशील है। मैं स्वयं वहां की स्थिति देखकर आया हूं। मुख्यमंत्री ने भी कुछ दिन पहले ही बुंदेलखंड की यात्रा की है।

सरकार ने वहां के जिलाधिकारियों को निर्देशित किया है कि जिन लोगों को खाद्यान्न की जरूरत है, उपलब्ध कराया जाए। जहां जरूरत हो, राहत शिविर लगाकर खाने-पानी की व्यवस्था की जाए। सूखा राहत के लिए बजट जारी किया जा चुका है। पशुओं के चारे के लिए अलग से पैसे दिए गए हैं।

खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू है। इसके अलावा बुंदेलखंड की समस्या के स्थायी समाधान के लिए सरकार कई नीतिगत पहल कर रही है। कई योजनाएं बनाई गई हैं। अगले बजट में इसका एलान होगा।’’

यह है जमीनी हकीकत

96 फीसदी रबी की फसल पिछले साल बर्बाद हुई। इस साल भी यही स्थिति है।

31 फीसदी हैंडपंप पानी की एक बूंद तक नहीं देते

51 फीसदी महिलाओं को पीने के पानी के लिए मीलों चलना पड़ता है।

ऐसा हो गया खान-पान
भोज्य पदार्थ--सामान्य किसान--गरीब किसान
सब्जियां--13.4--11.5 दिन
दाल--4--1.6
दूध--6.1--3.7

39 फीसदी सामान्य व 53 प्रतिशत गरीब परिवारों के यहां तो 30 दिन से दाल ही नहीं बनी। इस दौरान 15 प्रतिशत सामान्य तो 19 फीसदी गरीबों को एक दिन भूखे ही सोना पड़ा।

हर माह औसतन १२ किसानों की मौत के बावजूद प्रशासन न तो फसलों की तबाही को आत्महत्याओं का कारण मानता है न ही कर्ज वसूली के दबाव व साहूकारों के शोषण चक्र को स्वीकार करता है।

जानिये सरकारी तंत्र कितना असंवेदनशील

घर में ५ किलो आटा रखकर रिपोर्ट दी-
जब आटा था तो भूख से मर कैसे सकता है
२३ जनवरी को बांदा के नरैनी ब्लॉक के नौगंवा गांव के 60 वर्ष के किसान आशाराम ने दम तोड़ दिया। उनकी पत्नी चंपा ने बताया कि शाम को खेत की रखवाली करने जाते समय पति ने कहा कि दो रोटी सेंक दो तो खेत पर जाऊं।

आटा था नहीं तो रोटी कैसे बनती, आशाराम खाली पेट ही खेत पर चला गया। दूसरे दिन सुबह खेत से लौटते ही उसकी मौत हो गई। हंगामा मचा तो गांव पहुंचे अफसरों ने सबसे पहले उसके घर में पांच किलो आटा रखवाया। फिर कलेक्टर को रिपोर्ट दे दी कि घर में आटा रखा मिला, इसलिए आशाराम भूख से नहीं मरा।

 स्वयंसेवी राजा भइया बताते हैं कि पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर ने मौखिक तौर पर कुबूल किया कि आशाराम की मौत भूख से हुई है, पर हमें रिपोर्ट में इसका जिक्र करने की मनाही है। बकौल राजा भइया, हैरान हूं... किसानों की मौत को सरकारी तंत्र इतनी असंवेदनशीलता से कैसे ले सकता है?

और गहरा सकता है किसानों की मौत का मंजर

बुंदेलखंड में इस साल की खरीफ फसल की बर्बादी व रबी की बोआई न होने से किसानों की मौत का यह मंजर और गहराने की आशंका है।

इसकी बानगी ललितपुर जैसे 10 बांधों के जिले में देखी जा सकती है, जहां नवंबर 2015 से जनवरी 2016 तक, तीन माह में ही 22 किसान खुदकुशी कर चुके हैं।

सूखे का असर जाने के लिए स्वराज अभियान ने 27 अक्तूबर 2015 से 9 नवंबर 2015 के बीच जो सर्वे किया, उसके नतीजों को मानें तो आने वाले वक्त में बुंदेलखण्ड की बदहाली और गहराती हुई लगती है।

डीएम महोबा बोले
आपदा से किसी किसान ने नहीं की आत्महत्या
महोबा के डीएम वीरेश्वर सिंह स्वीकार तो करते हैं कि जिले का किसान निश्चित रूप से संकट में है, पर दैवी आपदा के चलते किसी आत्महत्या को स्वीकार नहीं करते। वे कहते हैं कि खाद्य सुरक्षा योजना लागू हो गई है और छह हजार लोगों को हर माह 15 किलो गेहूं व 10 किलो चावल मुफ्त दिया जा रहा है।
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फसल बर्बादी के नतीजे

सर्वे में फसल बर्बादी की जो तस्वीर सामने आई उसके अनुसार बुंदेलखण्ड में इस साल तिल 61 प्रतिशत, उर्द 68, अरहर 84, ज्वार 90, बाजरा 91, मूंग 92 व सोयाबीन की 96 फीसदी फसल नष्ट हो गई है। इस दौरान इन परिवारों से यह भी जानकारी मिली कि पिछली रबी की फसल 96 फीसदी बर्बाद हो गई थी।

अकाल की वजह से बुंदेलखण्ड में खान-पान में आए बदलाव को भी इस सर्वे ने रेखांकित किया है। हालात ऐसे हैं कि आधे गरीब किसानों को पिछले ३० दिन में दाल ही नहीं नसीब हुई। कइयों को तो भूखे ही सोना पड़ा।

पेट भरने के लिए बच्चों को स्कूल से निकलवा मजदूरी करवाई
स्वराज अभियान की सहयोगी संस्था परमार्थ के संजय सिंह बताते हैं कि सर्वे के दौरान 24 फीसदी ऐसे परिवार मिले जिन्होंने अपने बच्चों को बीते आठ माह में मजदूरी के लिए भेजा था।

36 प्रतिशत लोगों ने जिंदा रहने के लिए उधार लेकर खाना खाया और 22 फीसदी परिवारों ने स्कूलों से अपने बच्चों को निकाल लिया। इन गांवों के 27 प्रतिशत परिवारों ने चारे-भूसे के अभाव में अपने जानवरों को छुट्टा (अन्ना) छोड़ दिया है। 40 फीसदी परिवारों ने तो सदमे से उबरने के लिए अपने जानवरों को ही बेच डाला। और आखिर में इस सर्वे के जो नतीजे हैं वे सूखे व भुखमरी से निपटने के सरकारी दावे की कलई खोल देते हैं।

इसके अनुसार काम दिलाने की सबसे बड़ी योजना मनरेगा के कार्डधारक सिर्फ 59 फीसदी परिवारों में मिले। इसी तरह सरकारी राशन की दुकानों से प्रति गरीब परिवार को सिर्फ 25.7 किलो ही राशन मिल रहा है।
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