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सियासत और धर्म: ...जब राजनीतिक सत्ता पर हावी रहा धर्मसत्ता का प्रभाव, भाजपा ने इस तरह बनाया माहौल

Tue, 23 Nov 2021 10:54 AM IST
ishwar ashish चुनाव डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ

सार

1991 के इस दौर में राजनीतिक सत्ता पर धर्म पूरी तरह हावी रहा। संतों ने भाजपा की जीत के समीकरण बनाएं तो भाजपा विरोधी दलों पर मौलाना-उलमा का रंग दिखा।
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अयोध्या में साधु-संतों के बीच लाल कृष्ण आडवाणी (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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आमतौर पर चुनावी सभाओं में वोट दिलाऊ या जिताऊ समीकरण बनाने वाले नेताओं की मांग रहती है, पर 1991 के लोकसभा एवं विधानसभा के चुनावों में राजनीतिक सत्ता पर धर्मसत्ता का जबर्दस्त प्रभाव दिखा। सियासी किरदारों से ज्यादा संत व मौलाना सक्रिय दिखे। जाहिर है कि इनकी भूमिका से चुनाव में खूब ध्रुवीकरण हुआ। वोटों के बंटवारे में काफी हद तक धार्मिक समीकरणों ने अपना असर दिखाया। यह बात अलग है कि इस चुनाव ने राजनीति में हिंदुत्व की ताकत का एहसास कराकर भाजपा को न केवल उसकी राजनीतिक मजबूती का आधार समझाया, बल्कि भाजपा विरोधी दलों को भी भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया।

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साधु-संतों को राजनीति में उतारने की शुरुआत तो कांग्रेस ने ही कर दी थी। वहीं, दूसरी ओर गोरक्षपीठ के तत्कालीन महंत दिग्विजय नाथ जैसे कुछ संत ऐसे भी थे जिन्होंने कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर चुनावी मैदान में उतरना भी शुरू कर दिया था। पर, जितने बड़े पैमाने पर साधु-संतों की भूमिका 1991 के चुनाव में दिखी, उससे पहले कभी नहीं देखी गई थी।

भाजपा ने साधु-संतों को न केवल प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतारा, बल्कि चुनावी मंचों पर उनकी मांग अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, प्रमोद महाजन, कल्याण सिंह जैसे कुशल वक्ताओं की तरह रही। कथाकारों, भक्ति संगीत देने वाले संगीतकारों, रामायण एवं महाभारत धारावाहिक के अभिनेताओं की भी जनसभाओं में खूब मांग रही।
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दूसरी तरफ भी ऐसा ही नजारा रहा। भाजपा विरोधी दलों की तरफ से भी बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सहित कई मुस्लिम संस्थाओं के प्रमुख, मौलाना व उलमा उतारे गए, जिन्होंने विवादित ढांचा बचाने के नाम पर भाजपा को हराने की न केवल अपील की बल्कि कुछ ने भाषण भी दिए। हालांकि बंटे विपक्ष को इसका कोई खास लाभ नहीं मिल पाया। हां, इस तरह की ध्रुवीकरण की कोशिशों ने मुलायम सिंह यादव के पक्ष में मुस्लिमों का झुकाव जरूर करा दिया।

भाजपा ने इस तरह बनाया चुनावी माहौल

सोमनाथ से अयोध्या की कारसेवा में शामिल होने के लिए निकले लालकृष्ण आडवाणी ने समस्तीपुर से रिहा होने के बाद वहां से दिल्ली और फिर अयोध्या सड़क मार्ग से यात्रा करके राजनीतिक मिजाज के पारे को पहले ही गरमा रखा था। मौसम भी गरम हो रहा था। ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ नारों के साथ विश्व हिंदू परिषद ने कारसेवकों का अस्थिकलश गांव-गांव घुमाकर, हिंदू हितों की बात करने वाले राजनीतिक दल को ही समर्थन का आह्वान करके आडवाणी की यात्रा से ऊपर चढ़े सियासी पारे को और चढ़ाना शुरू कर दिया। इसी गरम माहौल में चुनाव की घोषणा हुई।

प्रोजेक्टर से दिखाया गया अयोध्या का घटनाक्रम
अयोध्या आंदोलन के सूत्रधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने शायद परदे के पीछे इस चुनाव को लड़ने का पूरा खाका पहले ही खींच रखा था। चुनाव की घोषणा के साथ ही दिल्ली से बड़ी संख्या में प्रोजेक्टर व वीसीआर के जरिये कारसेवा के दौरान सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए कोठारी बंधुओं के शव, अशोक सिंघल पर पुलिस की लाठियों के वार, संतों के साथ अभद्र व्यवहार की वीडियो क्लिप के साथ तैयार की गई फिल्मों को गांव-गांव दिखाना शुरू कर दिया।
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जिसका जितना तीखा भाषण, उसकी उतनी ही मांग

तीखे भाषण देने वाले साधु-संतों की चुनाव प्रचार में जबर्दस्त मांग थी। साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, आचार्य धर्मेंद्र, अशोक सिंघल को सुनने के लिए लोग देर रात तक सभाओं में जमे रहते। इनके भाषणों पर भीड़ का जोश कई बार सारी सीमाओं को पार कर जाता। साध्वी ऋतंभरा के भाषण के बाद कुछ इलाकों में तनाव जैसे हालात भी सामने आए। पर, राजनीति में सारा कुछ परिणाम पर निर्भर करता है, जो भाजपा के पक्ष में रहा।
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