मुजफ्फरनगर दंगे में केंद्रीय योजना के तहत मृतकों के आश्रितों को हासिल होने वाली तीन लाख रुपए की आर्थिक सहायता में पेंच फंस गया है।
यह पेंच पिछले दिनों केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए एक पत्र की वजह से फंसा है, जिसमें कहा गया है कि आर्थिक सहायता के पात्र वही हों, जिन परिवारों को सरकारी नौकरी न मिली हो।
असल में राज्य सरकार ने यह घोषणा की थी कि दंगे में जिन परिवारों का कोई सदस्य मरा है, उस परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा की गई थी।
जिस समय राज्य सरकार ने यह घोषणा की थी, केंद्र द्वारा मिलने वाली आर्थिक सहायता में ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी कि अगर ऐसे किसी पीड़ित परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी दी जा रही है तो वह परिवार केंद्र की इस सहायता के लिए पात्र नहीं होगा। केंद्र ने यह बंदिश 12 सितंबर 2013 को उत्तर प्रदेश सरकार को भेजे गए एक पत्र में लगाई है।
इसके जवाब में प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव ने केंद्र के अधिकारियों को भेजे अपने पत्र में भारत सरकार की उस गाइड लाइन का हवाला दिया है जिसमें जिला समिति की संस्तुति के लिए निर्धारित प्रारूप में दिए जाने वाले प्रमाण पत्र का उल्लेख है।
इसमें यह कहा गया है कि आतंकवादी, सांप्रदायिक और नक्सली हिंसा के पीड़ितों की सहायता के केंद्रीय योजना के तहत जिस तिथि को आर्थिक सहायता स्वीकृत की जा रही हो, उस तिथि तक यदि प्रभावित व्यक्ति या उनके परिवार के किसी सदस्य को अनुकंपा के आधार पर कोई स्थायी नौकरी न मिली हो, तो वह इस योजना के तहत लाभार्थी होगा।
यूपी के अफसरों ने केंद्र के इस रवैये पर आश्चर्य जताया है। अधिकारियों का कहना है कि प्रमुख सचिव गृह ने जो पत्र भेजा है उसमें पूछा है कि इस बात को व्याख्या सहित स्पष्ट किया जाए कि क्या प्रश्नगत सांप्रदायिक दंगों से पीड़ित व्यक्तियों की सहायता के लिए केंद्र योजना के तहत तीन लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जा सकती है या नहीं।
गौरतलब है कि दंगे में जिस परिवार के किसी सदस्य की मौत हुई हो, उसके आश्रित को राज्य सरकार द्वारा दस लाख रुपए, प्रधानमंत्री सहायता कोष से दो लाख रुपए और आतंकवादी, नक्सली व सांप्रदायिक घटना के पीड़ितों की सहायता के लिए केंद्रीय योजना में तीन लाख रुपए की सहायता मिलनी थी। लेकिन अब केंद्र सरकार के एक पत्र से तीन लाख की मदद मिलने में संशय बन गया है।