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लिव इन : पहले हम साथ-साथ हैं, अब हम आपके हैं कौन...

Fri, 16 Jul 2021 02:18 AM IST
लखनऊ ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
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रोली खन्ना
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कानूनी मान्यता मिलने के बाद जितनी तेजी से लिव इन का ट्रेंड सामने आया, अब उतनी ही तेजी से इसके चलते रिश्तों में आ रही दरार, टूट रहे परिवार की कहानियां सामने आने लगी हैं।
पहले साथ रहने की जिद का नतीजा, अब साथ छोड़ने की जल्दी बन चुका है। ऐसे रिश्तों को प्रेम व परिवार का नाम देने वाले इससे जल्द छुटकारा पाना चाहते हैं।
यही नहीं, अभी तक पति-पत्नी के बीत तनाव का कारण बनने वाले अवैध संबंधों को बढ़ावा देने के आधार भी लिव इन रिश्ता बन रहा है। 181 वन स्टॉप सेंटर, डीसीपी महिला अपराध व पारिवारिक परामर्श केंद्रों में बढ़ रहे मामले इसका प्रमाण हैं।
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लिव इन के ज्यादातर मामलों में कॉरपोरेट की नौकरी करने वाले या फिर सरकारी अधिकारी व कर्मचारी शामिल हैं।
किस तबके के कितने ज्यादा लोगों में इसका चलन
40 फीसदी मामले कॉरपोरेट क्षेत्र के लोगों के
30 फीसदी मामले सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों से जुड़े
30 फीसदी मामले निचले तबके व गैर पढ़े लिखे लोगों से संबंधित
आंकड़ों से समझें समस्या की गंभीरता
महिला अपराध व सुरक्षा- 02 मामले
181 वन स्टॉप सेंटर - 63 मामले
आली संस्था - 02 मामले
सुरक्षा पारिवारिक परामर्श केंद्र 20 मामले
(नोट ये सभी मामले जनवरी से जून 2021 तक के हैं)
कदम बढ़ाने से पहले परिणाम जान लीजिए
13 जुलाई 2021 का मामला
एक रेलवे अधिकारी पत्नी-बच्चों को छोड़कर दूसरे शहर में किसी दूसरी महिला के साथ लिव इन में रहने लगे। भेद खुला तो पत्नी ने आपत्ति जताई। वहीं लिव इन में साथ रहने वाली महिला ने भी विद्रोह कर दिया। मामला फिलहाल वन स्टॉप सेंटर तक पहुंच गया है।
12 जुलाई 2021 का मामला
पिता ने इच्छा के विरुद्ध जाकर बेटे की शादी कर दी। इसके बाद युवक अपनी पसंद की लड़की के साथ लिव इन में रहने लगा। युवक एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है। पढ़ा लिखा परिवार है, अब अपने-अपने हक की मांग को लेकर सभी पक्ष 181 पहुंच गए हैं।
होटल के बिल व यात्रा के टिकट से खुल जाती है पोल
जहां लड़का और लड़की दोनों अविवाहित हैं, वहां तो परस्पर अनबन व जरूरतें पूरी न कर पाना जैसे कारणों से झगड़े होते हैं। जबकि एक पक्ष के विवाहित होने के बाद किसी दूसरे के साथ लिव इन में रहने के मामलों की पोल होटल के बिल तो कभी यात्रा के टिकट से खुल जाती है। काउंसलर कहती हैं कि अक्सर जब विवाद के मामले सामने आते हैं तो शुरुआत ही यहीं से होती है कि पति की जेब से होटल का बिल व यात्रा का टिकट मिला। लिव इन में रहकर खर्च बढ़ता है और झगड़े का कारण भी बनता है।
छिनता सुकून, टूटते परिवार और भरोसा
181 वन स्टॉप सेंटर मैनेजर अर्चना सिंह कहती हैं कि पति-पत्नी के झगड़े, घरेलू हिंसा जैसे मामलों में तो ज्यादातर नतीजे सकारात्मक होते हैं। काउंसिलिंग के बाद परिवार एक हो जाते हैं। लिव इन के नतीजों में यही देख रहे हैं कि इसमें रहने वाले तो अलग होते ही हैं। साथ ही परिवार और एक दूसरे का रिश्तों के प्रति भरोसा भी टूट जाता है। ज्यादातर मामलों में यही देखा जा रहा है कि ऐसे रिश्तों की कोई मंजिल नहीं होती है।
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समझौता हो भी जाए तो संदेह खत्म नहीं होता
सुरक्षा परिवार परामर्श केंद्र की काउंसलर स्वर्णिमा सिंह कहती हैं कि लिव इन को ज्यादातर पढ़ा लिखा वर्ग तवज्जो दे रहा है। महिला हो या पुरुष दोनों के लिए यह क्षणिक आकर्षण और अवसरवादिता है। इसका नतीजा सिर्फ अलगाव ही होता है, समझौता हो भी जाए तो संदेह खत्म नहीं होता। निचले तबके में मामले संतानोत्पत्ति तक पहुंच जाते हैं और ज्यादातर महिलाएं गर्भवती होकर या गर्भपात के बाद सामने आती हैं।
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