बिजली उपभोक्ताओं व उपभोक्ता संगठनों ने कोरोना महामारी के मद्देनजर इस साल बिजली दरों में किसी भी तरह का वृद्धि का विरोध किया है। बिजली कंपनियों की तरफ से दाखिल वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) व नए स्लैब पर बिजली दरों के प्रस्ताव पर बृहस्पतिवार को जनसुनवाई के दौरान गैरसरकारी उपभोक्ताओं के साथ-साथ सरकारी उपभोक्ताओं की तरफ से भी दरों में कमी की मांग उठाई गई।
राज्य विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष आर.पी. सिंह, सदस्य के.के. शर्मा व वी.के. श्रीवास्तव की पूर्ण पीठ ने बृहस्पतिवार को दक्षिणांचल, पश्चिमांचल व केस्को के एआरआर व टैरिफ प्रस्ताव पर वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिये सुनवाई की। मध्यांचल व पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम की सुनवाई 28 सितंबर को होगी। सबसे पहले तीनों बिजली कंपनियों की तरफ से एआआर व नए स्लैब पर प्रस्तावित दरों के बारे में प्रस्तुतिकरण किया गया। कंपनियों का तर्क था कि दरों को तर्कसंगत बनाने तथा दरों के मौजूदा ढांचे के सरलीकरण की दृष्टि से स्लैब में बदलाव करके उसमें कमी की गई है। कंपनियों की तरफ से टैरिफ सुधार के लिए स्लैब में बदलाव को जरूरी बताते हुए इसे अनुमोदित करने की मांग उठाई गई।
दरों में16 फीसदी की कमी की जाए : उपभोक्ता परिषद
उपभोक्ताओं की तरफ से पक्ष रखते हुए राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने बिजली दरों में 16 प्रतिशत कमी करने के साथ-साथ घरेलू उपभोक्ताओं का फिक्स चार्ज व वाणिज्यिक उपभोक्ताओं का मिनिमन चार्ज समाप्त किए जाने की मांग की। वर्मा ने बिजली कंपनियों के ऊपर उपभोक्ताओं के निकल रहे 13,337 करोड़ रुपये का का फायदा देने के लिए सभी श्रेणी उपभोक्ताओं को 4 प्रतिशत का रेगुलेटरी लाभ दिए जाने की वकालत की। वर्मा ने स्लैब में बदलाव को असंवैधानिक करार देते हुए इसे खारिज करने की मांग भी उठाई। उनका कहना था कि कोरोना काल में उत्तराखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार व दिल्ली में बिजली दरों में कमी की गई है। इसी आधार पर यूपी में भी दरें कम की जानी चाहिए। वर्मा ने बिजली कंपनियों द्वारा छह प्रतिशत वितरण लाइन हानियों को आधार बनाकर 3500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त घाटा बताए जाने पर भी आपत्ति उठाई। वर्मा ने मीटर खरीद में अनियमितता, फिजूलखर्ची तथा निजीकरण की कोशिश जैसे मुद्दे उठाते हुए बिजली कंपनियों के कामकाज पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि बिजली कंपनियों की नाकामी का ठीकरा उपभोक्ताओं के सिर नहीं फोड़ा जाना चाहिए।
उद्योगों व मेट्रो की दरों में कमी की भी उठी मांग
आईआईए के संजीव अरोरा ने उद्योगों की दरों में कमी की मांग उठाते हुए कहा कि उद्योगों को केवीएच बिलिंग की जानी चाहिए। मेट्रो की तरफ से डा. सुशील कुमार व डीएमआरसी के सुबोध कुमार ने फिक्स चार्ज व न्यूनतम उपभोग गारंटी चार्ज समाप्त करने की मांग उठाई। इनका कहना था कि मेट्रो के लिए बिजली की दरों में कमी होनी चाहिए। बुंदेलखंड चैंबर ऑफ कामर्स के धीरज कुमार का कहना था कि प्रदेश में उद्योगों की बिजली दरें कम करना जरूरी है।
बुनकरों को छूट जारी रखें, कोरोना काल में दें राहत
बुनकर सभा के हाजी इफ्तिखार खान ने बुनकरों को मिलने वाली छूट जारी रखे जाने की मांग उठाई। उपभोक्ता सियाराम शर्मा, सत्येंद्र शर्मा समेत कई अन्य ने 1912 पर दर्ज कराई जाने वाली शिकायतों को बिना निस्तारित किए समाप्त कर दिए जाने का मुद्दा उठाया। तमाम अन्य उपभोक्ताओं ने कोरोना काल में दरों में कमी करके राहत देने की मांग की। आयोग के अध्यक्ष ने कहा की 28 सितंबर को मध्यांचल व पूर्वांचल की सुनवाई के बाद उपभोक्ताओं व संगठनों की तरफ से आए सुझावों के आधार पर उचित निर्णय किया जाएगा।
80 के बजाय 53 स्लैब होंगे
अगर राज्य विद्युत नियामक आयोग हरी झंडी दे देता है तो प्रदेश में बिजली दरों के अब 80 के बजाय 53 स्लैब ही होंगे। बीपीएल को छोड़ कर शहरी घरेलू उपभोक्ताओं के लिए तीन, कामर्शियल के लिए दो, लघु एवं मध्यम उद्योग के लिए दो स्लैब प्रस्तावित किए गए हैं। किसानों, विभागीय कर्मियों और भारी उद्योग के स्लैब में कोई परिवर्तन प्रस्तावित नहीं किया गया है। स्लैब का ढांचा बदलने से किसानों व भारी उद्योगों को छोड़कर अन्य श्रेणियों की दरों में परोक्ष रूप से बढ़ोतरी हो सकती है। शिक्षण संस्थाओं व धार्मिक आयोजनों के लिए बिजली दरें कम हो सकती हैं।
70,792 करोड़ रुपये का एआरआर
पावर कार्पोरेशन ने बिजली कंपनियों की तरफ से आयोग में 70,792 करोड़ रुपये का एआरआर दाखिल किया है। एआरआर में दिखाए गए लगभग 4500 करोड़ रुपये के घाटे की भरपाई आयोग पर छोड़ दी गई है।