मायावती के राज्यसभा से इस्तीफे को राजनीतिक पंडित दलितों का भरोसा फिर से जीतने का बड़ा दांव मान रहे हैं। बसपा के कई वरिष्ठ नेता भी मान रहे हैं कि लोकसभा और विधानसभा में बुरी हार के बाद सहारनपुर की घटना ने मायावती के नेतृत्व को पूरी तरह नकार दिया है।
पहली बार माया के सबसे बड़े वोट बैंक जाटव पर प्रहार किया गया, जिससे बसपा को अपनी राजनीतिक जमीन फिर से वापस पाने की संभावना मंद पड़ती दिख रही थी। लिहाजा बसपा सुप्रीमो ने दलित उत्पीड़न के नाम पर इस्तीफे का एलान कर दिया।
कांशीराम के जमाने से बसपा के एक नेता ने बताया कि रामविलास पासवान और उदित राज जैसे दलित नेता में से कोई भी मायावती की बिरादरी के नहीं थे। वहीं एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद भी माया की बिरादरी से नहीं माने जाते।
सहारनपुर की घटना के जरिये पहली बार मायावती के सबसे बड़े जाटव वोट बैंक को निशाना बनाया गया। इस घटना को लेकर वहां तीन बड़े प्रदर्शन हो चुके हैं, जिनमें मायावती का कहीं कोई कोई नामोनिशान नहीं रहा।
यहां तक कि कांशीराम की बहन को भी इन धरनों में लाया गया, जिन्होंने माया को निशाने पर लिया। इसके बाद फेसबुक, व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर मायावती के खिलाफ पूरा अभियान चलाया गया। सूत्रों का कहना है कि इन सभी घटनाओं से बसपा नेतृत्व चिंतित था। इसलिए बड़े राजनीतिक स्टंट के जरिये खोई साख को पाने की कोशिश की गई है। लोकसभा में बसपा की एक भी सीट नहीं है, जबकि विधानसभा में पार्टी 18 सीटों पर सिमट गई है।