आम चुनाव में हार के बाद मुलायम ने पार्टी में फेरबदल तो किए पर हार के मूल कारणों पर अब भी बात नहीं कर रहे। यह जगजाहिर है कि तुष्टिकरण और जातिवाद की राजनीति के कारण जनता ने सपा को नकार दिया लेकिन मुलायम ने अभी तक सर्वसमाज को खुद से जोड़ने के लिए अपनी योजनाओं को सार्वजनिक नहीं किया।
वहीं सपा प्रत्याशियों की शिकायत है कि विधायकों, मंत्रियों व पार्टी के लोगों ने सहयोग नहीं दिया जिससे वे चुनाव हार गए। अफसरों ने भाजपा के पक्ष में काम किया। दर्द बयां कर रहे हैं कि चुनाव के दौरान उनकी पार्टी के कई लोग नमो-नमो करते मिले।
भितरघात के कारण वे चुनाव हार गए। विधायक व मंत्री सफाई दे रहे हैं कि उन्होंने तो अपने क्षेत्र से पार्टी के उम्मीदवार को इतने वोट दिला दिए, जितने विधानसभा चुनाव में खुद उन्हें नहीं मिले थे। फिर भी वह नहीं जीत पाया तो वे क्या करें।
करारी शिकस्त से क्षुब्ध सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव को छोड़कर पूरी प्रदेश इकाई भंग कर दी।
मंत्रियों पर गिर चुकी है गाज
हार के बाद सपा के शीर्ष नेतृत्व ने मंत्री का दर्जा प्राप्त 36 लोगों की लालबत्ती छीन ली। सरकार के स्तर पर विकास कार्यों की समीक्षा शुरू कर दी गई है।
जनता से जुड़ने के नए कार्यक्रम तैयार करने का ऐलान किया जा रहा है, पर सपा का कोई बड़ा नेता हार का जमीनी कारण स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता।
कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि इतनी करारी शिकस्त का कारण जनता की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाना है। विकास के बजाय मुस्लिम तुष्टीकरण व जातिवाद की नीति पर चलना है।
मुलायम को थी हार की आशंका
ऐसा नहीं है कि सपा नेताओं को ऐसे नतीजे आने की आशंका नहीं थी। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पुराने भाषणों पर नजर डालें तो यह बात साबित हो जाती है।
सच तो यही है कि मुलायम तक को जनता की नाराजगी की जानकारी थी। वे ऐसे नतीजे आने को लेकर आशंकित भी थे। इसीलिए कई बार सरकार को जनता से संवाद बनाकर रखने की नसीहत दी। विधायकों व मंत्रियों को जनता से मेलजोल रखने को कहा।
पार्टी वालों को मर्यादा में रहने का पाठ पढ़ाते हुए आगाह किया, ‘सपा को भारी बहुमत के साथ जनता ने भारी जिम्मेदारी भी दी है। भरोसा टूटा तो लोकसभा चुनाव में मुश्किलें बढ़ जाएंगी।’
मुलायम ने अखिलेश को दी चेतावनी
सपा सुप्रीमों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी चेताया और कहा था कि, ‘मैं मुख्यमंत्री होता तो 15 दिन में कानून-व्यवस्था ठीक कर देता। कानून-व्यवस्था ठीक न हुई तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।’
सरकार के भ्रष्टाचार पर चेताया, ‘थाने व तहसील घूस का अड्डा बन गए हैं। इसे ठीक न किया गया तो मुसीबतें बढ़ेंगी।’
मुलायम ने यह नसीहत भी दी कि अधिकारियों के चक्कर में न पड़ो। ये तभी तक साथ हैं जब तक सत्ता में हो। इसलिए जनता से जुड़ने के उपाय करो। पर, कुछ नहीं हो पाया।
खुद की लापरवाही पड़ी भारी
जाहिर है कि सपा को खुद उसकी लापरवाही और मनमानी भारी पड़ी है। सभी को पता था कि सरकार को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। कानून-व्यवस्था की अनदेखी सरकार की साख को प्रभावित कर रही है।
सरकारी फैसलों से लोगों में यह संदेश जा रहा है कि सपा मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर आगे बढ़ रही है। कारण जो भी हों, सरकार ने इसे ठीक करने की चिंता नहीं की। सरकार व जनता के बीच संवाद शुरू नहीं हो पाया। अधिकारियों की मनमानी बरकरार रही।
नसीहतों के बेअसर रहने की बानगी देखिए, पिछले साल दिसंबर में जिस दिन मुलायम ने यह चेतावनी दी कि दबंगई करने वालों को पार्टी से निकाल बाहर किया जाएगा, उसी दिन बलिया में सपा के एक विधायक के पुत्र ने गांव वालों से मारपीट कर डाली।
गोंडा में एक कांग्रेसी नेता को सपाइयों ने निर्वस्त्र कर घुमाया। रायबरेली में भाजपा के एक नेता पर हमला बोल दिया। इन घटनाओं ने भी लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ाई।
तस्वीर का एक पहलू यह भी
लोगों से बातचीत में सपा की हार का एक दिलचस्प पहलू भी सामने आता है, जो बताता है कि सच्चाई सुनने व समझने से बचना भी सपा की पराजय की एक वजह रही।
पार्टी के ही एक मंत्री कहते हैं, ‘नेताजी से यह कौन कहे कि दो साल पहले विधानसभा चुनाव जीतने के बाद जिस तरह मुस्लिम-मुस्लिम जपा गया, इस चुनाव में उसकी प्रतिक्रिया हुई है।
पार्टी नेताओं का बार-बार यह कहना कि सपा सरकार मुसलमानों ने बनवाई है, हम सब पर बहुत भारी पड़ा। चुनाव के दौरान गली-गली में लोगों ने हम लोगों से यह सवाल पूछा कि उनकी लड़की को 30 हजार रुपये की मदद क्या सिर्फ इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि वे गरीब तो हैं लेकिन मुसलमान नहीं है।’
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद कहते हैं कि लोगों ने 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ सपा को वोट दिया था।
नहीं पूरी हुईं उम्मीदें
लोगों ने उम्मीद की थी कि सपा सरकार में विकास कार्य जमीन पर दिखेंगे, पर जब लोगों ने देखा कि सड़कों के गड्ढामुक्त होने के दावे सिर्फ मंत्रियों के बयान तक सीमित हैं। थानों पर सुनवाई नहीं हो रही है।
बिजली आपूर्ति के दावे जमीन पर नहीं उतर पा रहे हैं। सरकारी दफ्तरों का रवैया भी जस का तस है तो हमारी सरकार से भी उसका मोहभंग होने लगा।
रही-सही कसर पूरी कर दी बीच-बीच में आजम जैसे नेताओं के बयानों ने।
ध्रुवीकरण की धार से बंटाधार
मंत्री और पूर्व सांसद की बात तार्किक लगती है। अखिलेश ने मुख्यमंत्री पद संभालने के कुछ घंटे बाद ही जो पहले फैसले किए, उनमें मुस्लिम लड़कियों को 30 हजार रुपये की मदद देने का फैसला भी शामिल था।
इससे यह संदेश गया कि विकास और बसपा सरकार के चाल व चरित्र की नाराजगी पर चुनाव जीतने वाली सपा बदलने को तैयार नहीं है।
पूर्व की सपा सरकार की राह पर अखिलेश सरकार भी मुसलमानों के एजेंडे पर ही काम करेगी। रही-सही कसर पूरी कर दी आतंकी घटनाओं के आरोपियों पर से मुकदमा वापस लेने के ऐलान और जगह-जगह हुए सांप्रदायिक तनाव ने।
सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं पर अधिकारियों ने जिस तरह एकतरफा कार्रवाई की, उससे भी बहुसंख्यकों में सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ी।
मुस्लिम प्रेम ने डुबाई नाव
मुसलमानों को नौकरियां कितनी मिलीं, यह तो सरकार जाने लेकिन संसदीय कार्यमंत्री मो. आजम खां से लेकर विधान परिषद में नेता सदन अहमद हसन तक ने ऐलान खूब किए।
सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों को 20 प्रतिशत आरक्षण, सरकारी योजनाओं में मुसलमानों को प्राथमिकता देने का ऐलान हुआ।
पुलिस भर्ती में मुस्लिमों को तवज्जो की बात कही गई। इससे भी लोगों को लगा कि सरकार के एजेंडे में सिर्फ मुसलमान ही हैं।
मुजफ्फरनगर दंगा में सरकार की तरफ से सिर्फ पीड़ित मुस्लिम परिवारों के लिए आर्थिक मदद की घोषणा ने रही-सही कसर पूरी कर दी। न्यायालय तक को सरकार के इस फैसले पर कठोर रुख अख्तियार करना पड़ा।
जातिवाद और तुष्टिकरण की राजनीति
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं कि लोगों को लगा कि दो वर्ष पहले उन्होंने सपा को बदलाव के लिए वोट दिए थे लेकिन बदलाव तो दूर, सपा का नेतृत्व जातिवाद व तुष्टीकरण से ऊपर उठने को तैयार नहीं है।
लिहाजा लोग इस सरकार के खिलाफ गोलबंद हो गए। चुनाव लोकसभा का था। लोग यह जानते ही थे कि इस चुनाव में सपा और बसपा जैसे दलों को वोट देने से कोई बदलाव नहीं होने वाला है।
ये जीत भी गए तो केंद्र में उसी कांग्रेस की सरकार बनवाने में सहयोग करेंगे जिसकी नीतियों ने मंहगाई व भ्रष्टाचार बढ़ाया है। जिस सरकार के मंत्री भी तुष्टीकरण में सपा सरकार से पीछे नहीं हैं।
लिहाजा लोग इन सबके खिलाफ गोलबंद हो गए और इन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। पर, लगता है कि सपा के लोग अब भी सच्चाई समझने को तैयार नहीं हैं।