ऊंचाहार के थर्मल पावर स्टेशन के बॉयलर में हुआ विस्फोट क्या कोयले की सप्लाई में आए असंतुलन से बिगड़े प्रेशर की वजह से हुआ? थर्मल पावर के क्षेत्र में कई वर्षों तक काम कर चुके वरिष्ठ बिजली इंजीनियर शैलेंद्र दुबे फिलहाल ऐसा ही मानते हैं।
‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में उन्होंने घटना के बाद एनटीपीसी से जुड़े विशेषज्ञों से मिली जानकारियों और अपने अनुभवों के आधार पर वे बताते हैं कि कोयले के 10 मीटर आकार के क्लिंकर को तोड़ रहे मजदूर इस विस्फोट की चपेट में आए। उनके जरिए घटना के पीछे की स्थितियां और थर्मल पावर जनरेशन से जुड़ी जानकारियों को समझा जाए तो इस विस्फोट की पूरी कहानी सामने आ जाती है।
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स्टेज 1 :
कोयले से बिजली उत्पादन करने वाले थर्मल पावर स्टेशनों पर खदानों से खोद कर लाया गया कोयला ढेलों के रूप में होता है। ये ढेले कुछ सेंटीमीटर से आधा-एक मीटर तक के आकार केहो सकते हैं। छोटे-बड़े आकार के ये ढेले एक समान तापमान पर नहीं जल सकते। वे अपने आकार के अनुसार गर्मी पैदा करते हैं। जबकि बॉयलर को यह कोयला एक नियंत्रित मात्रा में ‘फीडिंग रेट’ पर चाहिए होता है। ऐसे में इन्हें जलाने से पहले पीसा जाता है। इसके पीछे यह भी वैज्ञानिक तर्क दिया जाता है कि बारीक पीसा कोयला ज्वलनशील गैस जैसी कुशलता से भी जलेगा। इसीलिए इसका पाउडर बनता है, जिसे पल्वराइज्ड कोयला कहते हैं। इसे आमतौर पर सिलेंडर रोलरों में पीसा जाता है।