फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ये हैं सात कारण, जिनसे थम सकती है हाथी की रफ्तार

Wed, 14 May 2014 03:10 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
मायावती भले ही बसपा के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने की बात कह रही हों लेकिन ये ऐसे कारण हैं जो पार्टी की संभावना को सीमित कर सकते हैं।
विज्ञापन


दो साल पहले प्रदेश के विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2013 में दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए चार राज्यों के चुनाव में हार का सामना कर चुकी बसपा की ताकत लोकसभा चुनाव में घटने की अटकलबाजियां हैं तो उसकी कई अहम वजहें हैं।

बसपा नेतृत्व ने पीछे के प्रदर्शनों से कोई सबक न लेते हुए चुनावी व्यूहरचना ही ऐसी बुनी जिससे उसे कम सीटें मिलने की भविष्यवाणियां की जाने लगी हैं। इस सबके बावजूद यदि बीएसपी अपना परफार्मेंस बरकरार रख पाती है या इससे बेहतर प्रदर्शन करती है, जैसा कि उसके नेताओं का दावा है तो इसका श्रेय उसके मजबूत सांगठनिक ढांचे को ही जाएगा।
विज्ञापन


तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी बीएसपी वर्कर चुनावी समर में जूझते नजर आए। ये हैं वो कारण जिससे पार्टी का प्रदर्शन खराब हो सकता है।

कारण एक: कांग्रेस पर ढुलमुल रवैया

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रति गुस्सा मुखर हो चुका था। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस संकेत को भी नहीं समझा।

वह यूपी में आकर कांग्रेस पर हमले बोलतीं और दिल्ली जाकर महंगाई व भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रही संप्रग सरकार का साथ देती रहीं। जब चुनाव की घोषणा हुई तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सामने कमजोर प्रत्याशी उतारा।

यहां तक कि वह इन क्षेत्रों में अपने प्रत्याशियों का प्रचार करने तक नहीं गईं। भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के प्रति जनता की नाराजगी में बसपा को भागीदार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उन्होंने ‘सबका’ शब्द का प्रयोग इसी मिलीभगत के लिए कर डाला। सबका में ‘स’ का मतलब सपा, ‘ब’ का मतलब बसपा और ‘का’ का अर्थ कांग्रेस बताते रहे। बसपा का वोट बैंक कहे जाने वाले दलित वोटर तक डोलते नजर आए।

दूसरा कारणः मायावती ही सर्वेसर्वा

बसपा में मायावती के बाद कौन? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। पार्टी में मायावती के बाद सतीश चंद्र मिश्र, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य व रामअचल राजभर अगली लाइन के नेता जरूर हैं पर पार्टी में ये नेता अघोषित तौर पर अपने-अपने समाज के नेता की पहचान रखते हैं।

मायावती जब अपने को दिल्ली की दावेदार पेश करती हैं तब वह यह बताने की स्थिति में नहीं कि यूपी में उनकी जगह कौन लेगा?

भाजपा के कार्यकर्ता दलितों में यह मजबूती से समझाते रहे कि मायावती प्रधानमंत्री के लिए सिर्फ कहती हैं, वह मुख्यमंत्री की कुर्सी की दावेदारी छोड़ने वाली नहीं हैं, क्योंकि उनके बाद कौन?

पीएम के चुनाव में भाजपा का साथ दीजिए, सीएम का मौका आएगा तो जो मर्जी। वरना, यह वोट बसपा को नहीं कांग्रेस को जाएगा जिसने जीना दूभर कर दिया।

तीसरा कारणः पार्टी नेता खुद वंशवाद बढ़ाने वाले

बसपा में जिन बड़े नेताओं पर चुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी थी वे आधे वक्त तक अपने-अपने बच्चों की जीत के लिए जूझते नजर आए।

राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी का बेटा अफजल सिद्दीकी फतेहपुर में साध्वी निरंजन ज्योति के सामने प्रत्याशी था तो दूसरे महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी डा. संघमित्रा सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के सामने मैनपुरी में।

ये नेता चुनाव का आधा वक्त अपने-अपने बेटे-बेटियों की जीत सुनिश्चित कराने में लगे रहे। विधानसभा का चुनाव भी न जीतने वाले इन युवाओं को लोकसभा का चुनाव लड़ाकर पार्टी ने संबंधित क्षेत्र के कॉडर में दूसरी पार्टियों की तरह वंशबेलि को बढ़ाने वाला ही माना।

दूसरा, स्वतंत्र होने पर जो वक्त ये अन्य प्रत्याशियों को दे सकते थे, नहीं दे पाए।

चौथा कारणः टिकट रद्द कर दिया

मायावती ने अन्य दलों की अपेक्षा सबसे पहले लोकसभा प्रभारी के रूप में प्रत्याशियों की घोषणा शुरू कर दी। पर, जब चुनाव का मौका आया तो दूसरे प्रत्याशी बना दिए गए।

गौर करने वाली बात ये है कि प्रदेश के आधे से अधिक लोकसभा प्रभारी साल-डेढ़ साल तक लाखों रुपये फूंकने के बाद बदल दिए गए। कई क्षेत्रों में तो कई-कई बार बदले गए। नतीजा ये हुआ कि जो हटाए गए उनमें कई या तो चुपचाप बैठ गए या दूसरे दलों से जुगाड़ कर प्रत्याशी बन गए।

यही नहीं चुनाव के काफी पहले जीते 20 सांसदों में से 10 का टिकट काट दिया गया। इसे बड़ी रणनीतिक चूक मान सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि टिकट कटने पर मौजूदा सांसदों के निष्क्रिय होने की संभावना बढ़ जाती है और जो नए आते हैं उन्हें काम का पूरा मौका नहीं मिलता। इसका गंभीर असर बसपा जैसे संगठन की चुनाव तैयारी पर पड़ता है जहां पूरा चुनाव प्रबंधन प्रत्याशी की ताकत पर निर्भर करता है।

पांचवा कारणः जुबानी जंग, जनांदोलन से दूर

बसपा ने ऐसी पार्टी की छवि बनाई है जो सत्ता के खिलाफ अपने विरोध-प्रदर्शन के लिए आंदोलन का रुख नहीं अपनाती। बड़ी से बड़ी घटनाएं हुई, बसपा नेता प्रेस कांफ्रेंस कर विपक्ष की भूमिका अदा करते रहे।

गन्ना बकाया भुगतान में मुश्किलें, दलित उत्पीड़न, प्रदेश की कानून-व्यवस्था को लेकर इस पार्टी ने विधानसभा में आवाज उठाई तो उसका कोई खास नतीजा नहीं निकला।

किसान परेशान रहे, उनके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं रहा। मुजफ्फरनगर जैसे दंगे में जब मुसलमानों में सपा सरकार के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश था, महीनों तक बसपा नेता वहां गए तक नहीं।

मुसलमानों में इसका गुस्सा साफ नजर आया। पश्चिम में जहां उसके कई सांसद थे, पुरानी मिलना मुश्किल माना जा रहा है।

छठा कारणः संवाद की कमी

आज जब दुनिया तेजी से भाग रही है संवाद व संपर्क के नए-नए माध्यम आ गए हैं, बसपा परंपरागत प्रचार माध्यम पर ही निर्भर रही। पार्टी चाहकर भी अपनी बात अन्य पार्टियों के मुकाबले अपनों तक नहीं पहुंचा पाई।

प्रदेश में बड़ी से बड़ी घटना हो, पार्टी की ओर से आधिकारिक रूप से बयान रखने के लिए कोई अधिकृत नहीं। पार्टी व मीडिया के बीच बड़ा कम्युनिकेशन गैप भी एक बड़ी वजह है।

चुनाव छोड़ दीजिए, आम दिनों में किसी घटना के बाद जब दूसरी पार्टियों से बयान आ जाते हैं, बसपा में कई बार दो-दो दिन बाद प्रेस कर पार्टी का स्टैंड रखा जाता है।

इससे बसपा को अन्य पार्टियों के मुकाबले प्रचार का उतना अवसर भी नहीं मिल पाता। सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी का चर्चा से गायब रहना कार्यकर्ताओं तक को अखरने लगता है।

सांतवां कारणः प्रचार में नहीं दिखी तेजी

पिछले लोकसभा चुनावों को देखें तो बसपा सुप्रीमो मायावती एक-एक दिन में चार-चार जनसभाएं तक करती नजर आती थी। इस बार उन्होंने चुनाव अभियान शुरू किया तो रोज दो जनसभाएं ही करती नजर आईं।

कई जिलों में वह स्वयं प्रचार के लिए पहुंची ही नहीं। बसपा कार्यकर्ता भी मानते हैं कि यदि जनसभाओं की संख्या बढ़ती और कम से कम हर लोकसभा सीट पर एक जहां जरूरत होती तो दो जनसभाएं हो जाती तो नतीजों में और रफ्तार बढ़ सकती थी।

मायावती के उलट सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह एक-एक दिन में तीन से पांच जनसभाएं करते नजर आए।

भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रव्यापी अभियान के बावजूद प्रदेश में अधिकतर सीटों पर पहुंच बनाई।

कैडर अब भी बड़ी ताकत

लोकसभा चुनावों पर गहरी नजर रखने वाले बताते हैं कि बसपा के पास कैडर अब भी बड़ी ताकत है। अभी बड़ा वर्ग है जो हाथी निशान देखकर वोट देता है।

इस चुनाव में भी प्रत्याशी कोई रहा हो, कैडर ने पूरा जोर लगाया है। पिछले एक साल से वह इस चुनाव की तैयारी में लगा रहा।

मायावती जहां सभा करने पहुंची वहां और जहां नहीं गईं वहां, कैडर अपने काम में लगा रहा। इसलिए यदि वह अपना परफार्मेंस बरकरार रख पाती है या कुछ सुधार दिखाती तो यह श्रेय उसे ही जाएगा।
विज्ञापन

अब तक का प्रदर्शन

वर्ष-जीती सीटें-मत प्रतिशत
1989-02-9.93
1991-01-8.70
1996-06-20.61

1998-04-20.90
1999-14-22.08
2004-19-24.67

2009-20-27.42
2012 विधानसभा चुनाव-80 सीटे -25.9 प्रतिशत वोट
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें