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बिना ड्राइवर धूल खा रहीं एंबुलेंस

Mon, 23 Sep 2013 08:17 AM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
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सरकारी अस्पतालों को दी गई एंबुलेंस गैराज में धूल खा रही हैं। जो एंबुलेंस संविदा कर्मचारियों के सहारे चल रही हैं वो मरीजों की सेवा के बजाए वीआईपी ड्यूटी में लगी हैं।
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अस्पताल प्रशासन कई बार स्वास्थ्य विभाग से ड्राइवरों की मांग कर चुका है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल में कुल छह एंबुलेंस है। मानकों के अनुसार, छह एंबुलेंस पर 18 ड्राइवरों की जरूरत है। जबकि नियुक्ति छह की हैं और उसमें से दो ड्राइवर संविदा के हैं।

अस्पताल के सीएमस डॉ. एसके हसन ने बताया कि सरकार तो एंबुलेंस दे रही है, लेकिन ड्राइवरों की कमी से मरीजों के साथ अस्पताल प्रशासन को भी परेशानी उठानी पड़ती है। इसे लेकर सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव को कई बार पत्र लिखा लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
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बलरामपुर अस्पताल में चार एंबुलेंस हैं। यहां छह ड्राइवरों में से दो संविदा पर हैं। अस्पताल प्रशासन ने नई एंबुलेंस मिलने के बाद स्वास्थ्य निदेशालय में संविदा पर ड्राइवर की नियुक्ति की मांग की थी।

लेकिन निदेशालय के अधिकारियों ने मना कर दिया। अस्पताल के निदेशक डॉ. टीपी सिंह ने बताया कि जैसी व्यवस्था है उसके हिसाब से ही मरीजों को सुविधा दी जा रही है।

गोमतीनगर स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में पांच एंबुलेंस हैं। लेकिन ये एंबुलेंस अस्पताल क गैराज में बंद खड़ी हैं। अस्पताल के सीएमस डॉ. आरसी अग्रवाल ने बताया कि ड्राइवरों की कमी से दिक्कत हो रही है।

रात में अगर मरीज की तबीयत खराब हो जाए तो उसे केजीएमयू पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। कुछ यही हाल डफरिन अस्पताल का है। यहां दो एंबुलेंस हैं। इनमें से एक ड्राइवर संविदा का है। अस्पताल की सीएमस डॉ. सुबोध वैध के मुताबिक ड्राइवरों की कमी की वजह से रात में अक्सर दिक्कत आती है।

यही हाल इंदिरानगर बाल महिला चिकित्सालय का है। यहां करीब 25 दिन पहले नई एंबुलेंस मिली लेकिन यह भी ताले में बंद है। अस्पताल की सीएमएस डॉ. सुषमा मिश्रा ने बताया कि जब ड्राइवर नहीं है तो गाड़ी का पंजीकरण कराने कौन ले जाएगा।
वीआईपी ड्यूटी में लगी रहती है सिविल की एएलएस सिविल अस्पताल में सिर्फ एक एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस है। चिकित्सकों के मुताबिक, अस्पताल की ये आधुनिक एंबुलेंस ज्यादातर समय वीआईपी ड्यूटी में रहती है। मरीजों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता। अगर अस्पताल में भर्ती किसी मरीज को तुरंत केजीएमयू या पीजीआई भेजना हो तो मुश्किल हो जाती है।
एंबुलेंस के नाम पर सिर्फ गाड़ीकहने को तो स्वास्थ्य विभाग एंबुलेंस बांट रहा है, लेकिन हकीकत ये है कि इनमें कोई सुविधा नहीं होती है। अस्पताल के चिकित्सकों और अधिकारियों की मानें तो हाल में मिली किसी एंबुलेंस में कोई सुविधा नहीं है।

अस्पताल प्रशासन को खुद ही अपने स्तर पर उसमें ऑक्सीजन सिलेंडर, फर्स्ट एड किट और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करनी पड़ रही है।

स्वास्थ्य विभाग की इस लापरवाही से एंबुलेंस के नाम पर मरीजों को ढोने के लिए गाड़ियां मिल रही है। इसमें मरीजों की जान हमेशा ही सांसत में बनी रहती है। 
अस्पताल उठा रहे 108 का गलत फायदा108 समाजवादी एंबुलेंस सेवा के ड्राइवरों की मानें तो उनका काम सिर्फ गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाना हैं, लेकिन जब वो किसी मरीज को अस्पताल ले जाते हैं तो अस्पताल के कर्मचारी मरीज को अपनी एंबुलेंस के बजाए 108 एंबुलेंस से ही भेजने को विवश करते हैं।

इन्कार पर अस्पताल के कर्मचारी धमकी देते हैं कि अगर मरीज को कुछ हुआ तो उसके जिम्मेदार तुम ही लोग होगे। इससे न चाहते हुए भी उन मरीजों को भी दूसरे अस्पताल पहुंचाना पड़ता है, जबकि यह जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन की है।
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