सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव आज अपना 75वां जन्मदिन मना रहे हैं। पहलवान और शिक्षक रहे मुलायम ने लंबी सियासी पारी खेली। तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे। केंद्र में रक्षा मंत्री रहे। उन्हें बेहद साहसिक सियासी फैसलों के लिए भी जाना जाता है।
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सातवें दशक में सियासी पारी शुरू करने वाले मुलायम के पुराने साथी राजेन्द्र चौधरी के पास मुलायम से जुड़ी अनगिनत कहानियां हैं। नेताजी के जन्मदिन पर उन्होंने ‘अमर उजाला’ के पाठकों के लिए कुछ दिलचस्प किस्सों को साझा किया है।
राजेंद्र बताते हैं कि बात 1974 की है। मैं गाजियाबाद नगर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा था। चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली हुई। इसके खिलाफ विधानमंडल भवन पर बड़ा प्रदर्शन हुआ। नेताजी मुलायम सिंह यादव विधायक थे और दारुलशफा ए ब्लॉक में रहते थे। उस प्रदर्शन में पहली बार उनसे मिला।
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उनके गर्मजोशी से मिलने, गतिशीलता और राजनीतिक जज्बे ने पहली मुलाकात में ही प्रभावित किया। इसके बाद जेपी आंदोलन शुरू हुआ, इमरजेंसी लगी। नेताजी आपातकाल में इटावा जेल में रहे और मैं मेरठ जेल में बंद था। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो नेताजी सहकारिता मंत्री बनाए गए।
रात भर कार में सफर करते, कार में ही सोते
राजेंद्र चौधरी बताते हैं कि मैं गाजियाबाद सीट से चुनाव जीतकर आया था। जब भी मैं विधानसभा या विधानमंडल दल की बैठक में बोलता, नेताजी बधाई देकर हौसला बढ़ाते थे। 1980 में नेताजी चुनाव हार गए। चौधरी चरण सिंह ने उन्हें लोकदल का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, मैं प्रदेश महामंत्री था।
1980 से 1989 तक मैं पार्टी दफ्तर में ही रहा। नेताजी के संघर्ष, काम करने के तरीके, उनकी ऊर्जा को नजदीक से देखा। 1982 में चौधरी साहब ने मुलायम सिंह को एमएलसी बनाया और विधान परिषद में नेता की जिम्मेदारी सौंपी।
नेताजी ने संगठन को खड़ा करने के लिए कड़ी मेहनत की। संसाधन कम थे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। पार्टी के पास पुरानी एंबेसडर कार थी। जिलों में कार्यकर्ता सहयोग करते थे। पेट्रोल की व्यवस्था करते थे। नेताजी रात भर कार से सफर करते, कार में ही सो लेते और दिन में सभाएं करते।
लखनऊ आते तो नौजवानों को पार्टी से जोड़ने, मंडल कमीशन, बेरोजगारी भत्ते और किसानों की नीतियों को लेकर बात करते थे। जोखिम उठाकर काम करने का जज्बा और निर्भीकता कोई उनसे सीखे। उन्होंने आम लोगों, कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न और जनसमस्याओं को जनांदोलन बनाया। हर बड़ी घटना पर वे खुद मौकेपर पहुंचते और आंदोलनों की अगुवाई करते थे।
जीवटता से हताशा को संभावना में बदला
1984 में लोकदल के केवल दो सांसद जीते थे। बागपत से चौधरी चरण सिंह और एटा से महफूज अली खां उर्फ प्यारे मियां। पार्टी में मायूसी थी लेकिन मुलायम ने हताशा को पास नहीं फटकने दिया। प्रदेश अध्यक्ष के नाते पूरे सूबे का दौरा किया। चौधरी साहब और अन्य नेताओं के कार्यक्रम करवाए। जनता के लिए संघर्ष किया। हताशा को संभावना में बदला।
1985 के विधानसभा चुनाव में लोकदल ने 86 सीटें जीतीं। मुलायम नेता विरोधी दल बने। 1986 में चौधरी साहब बीमार पड़ गए। अजित सिंह भी विदेश से लौटकर राजनीति में आ गए। उनकी महत्वाकांक्षा से लोकदल अ और ब में बंट गया। 55 विधायक अजित सिंह के साथ चले गए।
मुलायम के साथ केवल 30 विधायक रह गए। समाजवादी सोच के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण हम मुलायम सिंह के साथ आ गए। नेताजी ने हार नहीं मानी। उन्होंने क्रांतिकारी मोर्चा बनाया। क्रांति रथ से पूरे प्रदेश का सघन दौरा किया।
अक्तूबर 1987 में लखनऊ में ऐतिहासिक रैली की। 1988 में जनता दल बना और 1989 में मुलायम मुख्यमंत्री बने। 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी उन्होंने सभी का हौसला बढ़ाया। जनता के बीच जाने की सलाह दी।
इस तरह दूधिये की मदद की नेताजी ने
नेताजी की कोठी व पार्टी कार्यालयों में बहुत सारे ऐसे लोग भी आते थे जिनके पास सर्दियों में गर्म कपड़े नहीं होते थे, जूते नहीं थे या जो बीमार थे। ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि नेताजी ने उनकी समस्या हल करने के साथ ही उनके लिए कपड़ों, जूतों और किराये तक की व्यवस्था कराई।
विधानसभा 2012 का चुनाव चल रहा था। नेताजी को चुनावी सभा में जाना था। मैं उन्हें छोड़ने एयरपोर्ट जा रहा था। कृष्णानगर के पास यातायात व्यवस्थित रखने के लिए पुलिस ने एक दूधिये को रोका तो उसकी साइकिल गिर गई और दूध बिखर गया। नेताजी ने गाड़ी रुकवाई। डरे-सहमे दूधिये को बुलाकर पूछा कि उसका कितना नुकसान हुआ है। उसे तत्काल दो हजार रुपये दिए।
गाड़ी में जाते हुए नेताजी से राजनीतिक चर्चा चल रही थी लेकिन इस घटना के बाद एयरपोर्ट तक दूधिये पर ही चर्चा होती रही। नेताजी कह रहे थे कि कितनी जल्दी उठकर कितने घरों से दूध लाया होगा। घर जाकर वह क्या जवाब देता? नेताजी इतने संवेदनशील हैं कि किसी को दुखी देख ही नहीं सकते।
मुलायम तीन बार मुख्यमंत्री रहे और गांव, किसानों के लिए उसी तर्ज पर 70 फीसदी बजट राशि गांव और किसानों के लिए आवंटित की जैसे चौधरी चरण सिंह ने केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में की थी। चरण सिंह उन पर बहुत विश्वास रखते थे और उन्हें वैचारिक उत्तराधिकारी मानते थे। वे सार्वजनिक तौर पर यह बात कह चुके थे।
कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान नेताजी अपना जन्मदिन नहीं मनाते हैं। वे पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए जन्मदिन के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं।
फिल्मों के शौकीन नहीं नेताजी आम तौर पर राजनीतिक चर्चा ज्यादा करते हैं। पढ़ने में भी उनकी दिलचस्पी रहती है। वे युवाओं को लेकर काफी बात करते हैं, उन्हें आगे बढ़ाते हैं। वे फिल्मों के शौकीन नहीं रहे। फिल्में तो मैं और बेनी प्रसाद वर्मा ज्यादा देखते थे। जहां तक मुझे याद आ रहा है, नेताजी ने अमिताभ बच्चन की ‘बागवां’ फिल्म देखी थी।