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भीड़ और उन्माद के चलते कुछ घंटों में ढह गया पांच सदी पुराना ढांचा, पढ़ें- क्या हुआ था 4,5 और 6 दिसंबर को

Thu, 01 Oct 2020 12:24 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
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राम लला
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वार्ताओं और आश्वासनाें के दौर चले। केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच तनातनी हुई। शह और मात का खेल चला। मान-मनौवल हुई। न्यायालय का हस्तक्षेप भी हुआ, पर 6 दिसंबर घटकर रहा। बेकाबू और उन्मादी भीड़ के चलते कुछ घंटों में ढांचा ढह गया और संबंधित स्थल पर अस्थायी मंदिर बना दिया गया। 
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तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने संतों को तीन महीने का आश्वासन देकर 9 जुलाई 1992 को शुरू हुए निर्माण को तो रोकने पर राजी कर लिया, लेकिन वादे के मुताबिक इस अवधि में वे कोई सर्वमान्य समाधान नहीं दे सके। उन्होंने संतों, विश्व हिंदू परिषद, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के बीच वार्ता भी कराई। कई विकल्प रखे गए, लेकिन समाधान नहीं निकला।

इसी बीच संतों की 30 अक्तूबर 1992 को हुई पांचवीं धर्म संसद ने 6 दिसंबर से दूसरी कारसेवा शुरू करने का एलान कर दिया। वार्ताओं का सिलसिला टूट गया। कारसेवा रुकवाने के लिए कुछ लोग न्यायालय पहुंच गए।
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केंद्र सरकार द्वारा ली गई तीन महीने की मोहलत के दौरान विहिप शांत नहीं बैठी थी।

उसने श्रीराम पादुका पूजन के बहाने देशभर में मंदिर पर जनजागरण कार्यक्रम के जरिये अयोध्या में जन्मभूमि स्थल पर रामलला के भव्य मंदिर की आकांक्षाओं को और हवा दे दे थी। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी से वार्ता टूटी तो विहिप ने 15 नवंबर से 6 दिसंबर की कारसेवा के लिए लोगों को अयोध्या आने का आमंत्रण देने की यात्राएं प्रारंभ कर दीं। उधर, मुस्लिम संगठनों के कारसेवा के विरोध के एलान से तनातनी काफी बढ़ गई। माहौल तनावपूर्ण हो गया।

तनातनी और आश्वासनों का दौर

केंद्र की राव सरकार और प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार के बीच तनातनी और दांव-पेंच शुरू हो गए। केंद्र ने संबंधित स्थल पर कुछ होने पर राज्य सरकार की बर्खास्तगी की चेतावनी दी तो विहिप, भाजपा और प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह सरकार में वरिष्ठ मंत्री लालजी टंडन ने जवाबी चेतावनी दी और कहा कि ऐसा कुछ हुआ तो और उग्र कारसेवा होगी।

मुख्यमंत्री कल्याण ने राव पर निशाना साधते हुए कहा कि जब वे निजी बातचीत में संबंधित स्थल को मंदिर स्वीकार कर चुके हैं तो अब किस बात पर टालमटोल कर रहे हैं। मंदिर मुद्दे का हल निकालना एकता परिषद के वश का नहीं है। विहिप ने कहा कि कारसेवा उसी जगह होगी जहां राव के आश्वासन पर 26 जुलाई 1992 को बंद हुई थी।

कल्याण ने दिया हलफनामा
प्रधानमंत्री राव ने परिस्थितियों को विपरीत होते देखा तो उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह प्रो. राजेन्द्र सिंह रज्जू भैया से बातचीत की। रज्जू भैया ने उन्हें ढांचे की रक्षा का आश्वासन दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी यूपी सरकार से विवादित स्थल पर कोई नया निर्माण न होने देने का आश्वासन मांगा।

हलफनामा दाखिल कर तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण ने सर्वोच्च न्यायालय को आश्वस्त किया कि विवादित स्थल पर कोई स्थायी या अस्थायी निर्माण नहीं करने दिया जाएगा। कारसेवा केवल प्रतीकात्मक होगी। तब सर्वोच्च न्यायालय ने कारसेवा की अनुमति दे दी। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र की रिसीवर नियुक्त करने की मांग नहीं मानी। हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट को किसी जिला न्यायाधीश को बतौर पर्यवेक्षक नियुक्त करने को कहा, जो इस बात पर नजर रखता कि राज्य सरकार दिए गए आश्वासन के मुताबिक काम कर रही है या नहीं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुरादाबाद के तत्कालीन सत्र न्यायाधीश तेजशंकर को पर्यवेक्षक नियुक्त किया।

4 दिसंबर, 1992

- कांग्रेस की फैजाबाद से अयोध्या तक शांति मार्च निकालने की कोशिश को पुलिस ने सफल नहीं होने दिया। तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को लखनऊ में ही अयोध्या जाने से रोककर दिल्ली भेज दिया गया। 

- तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री शंकर राव चह्वाण ने राज्यसभा में बयान दिया कि केंद्र किसी से टकराव नहीं चाहता, पर स्थिति बिगड़ने पर संविधान की गरिमा बनाए रखने के लिए वह कोई भी कदम उठा सकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रदेश सरकार सांविधानिक जिम्मेदारी निभाएगी और केंद्र को हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

5 दिसंबर, 1992
- भाजपा सहित संघ परिवार के सभी संगठनों ने अपने कार्यकर्ताओं को अयोध्या पहुंचने को कह दिया था। इन कार्यकर्ताओं के साथ देश के विभिन्न राज्यों से कारसेवक भी अयोध्या पहुंच चुके थे। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरलीमनोहर जोशी, प्रमोद महाजन, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, आचार्य धर्मेंद्र सहित कई शख्सियतें अयोध्या पहुंच चुकी थीं। अशोक सिंहल और विनय कटियार तो पहले से ही अयोध्या में थे। 

- संघ के दो प्रमुख पदाधिकारी एचवी शेषाद्रि, कुपहल्ली सीतारमैया सुदर्शन और विहिप नेता मोरोपंत पिंगले भी अयोध्या आ चुके थे। अलबत्ता अटल बिहारी वाजपेयी शाम को लखनऊ में भाषण देकर और इस बार हार्दिक इच्छा के बावजूद संगठन के निर्देश पर अयोध्या न जा पाने पर अफसोस जताकर रात में दिल्ली लौट चुके थे। 

- सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से नियुक्त पर्यवेक्षक तेजशंकर भी अयोध्या में थे। वह ‘अयोध्या में सब ठीक-ठाक है, न्यायालय के आदेश का पालन हो रहा है’ की रिपोर्ट भेज रहे थे। बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंच चुके थे।

6 दिसंबर, 1992
उस दिन रविवार था। अयोध्या की सुबह रोज की तरह शांत दिख रही थी, पर कारसेवकों के कुछ जत्थे विहिप की कारसेवा के स्वरूप से सहमत नहीं दिख रहे थे। हालांकि उनकी असहमति के स्वर मुखर नहीं थे, पर कई बार बुलाने के बावजूद मंदिर निर्माण की दिशा में ठोस काम शुरू न होने से वे संभवत: आक्रोशित थे।

ब्रह्म मुहूर्त के साथ ही कुछ कारसेवकों का समूह तो सरयू तट पर पहुंचा, जहां से उन्हें  एक मुट्ठी बालू, मिट्टी और थोड़ा जल लेकर संबंधित स्थल पर पहुंचना था, पर इनकी बड़ी संख्या सीधे विवादित परिसर की ओर बढ़ रही थी। जो कारसेवक स्नान करने सरयू तट पर गए थे, उनमें भी कई नारा लगा रहे थे- ‘बालू नहीं डालने आए हैं, ढांचा गिराने आए हैं।’

पर, लोगों ने इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया या देने की जरूरत नहीं समझी। सभी को शायद भरोसा था कि कारसेवक निर्देशों का पालन करेंगे। विवादित ढांचे को चारों तरफ से सुरक्षा बलों ने घेर रखा था। दीवार के साथ कंटीले तार की बाड़ तो थी ही। सच्चाई तो संघ जाने, लेकिन उसने और विहिप ने भी अपने प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के जरिये भी विवादित ढांचे के चारों तरफ घेरा बनाकर सुरक्षा में सहयोग का संदेश देने की कोशिश की थी कि उसका इरादा ढांचे को किसी तरह का नुकसान पहुंचाने का नहीं है। यह इससे भी लग रहा था कि जैसे ही कोई कारसेवक रामकथा कुंज की दीवार को पार करने की कोशिश भी करता तो संघ के स्वयंसेवक ही उसे बाहर धकेल देते। इसको लेकर कई बार झगड़े की नौबत भी आई। लेकिन भीड़ का उन्माद बेकाबू होता जा रहा था।

समझ नहीं पाए या समझने की कोशिश नहीं...

-  विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल ने 6 दिसंबर की कारसेवा के स्वरूप की घोषणा करते हुए कहा, ‘कारसेवा अपराह्न 12.15 से शुरू होगी। कारसेवक सरयू नदी से थोड़ी बालू, मिट्टी और जल लेकर निर्धारित स्थल पर पहुंचेंगे और वहां बनाए गए गड्ढे में डालकर प्रतीकात्मक कारसेवा करके लौट जाएंगे।’ ये तो संघ परिवार का शीर्ष नेतृत्व जाने कि उसकी तरफ से जो कुछ किया जा रहा था, वह केंद्र सरकार और प्रशासन को धोखे में डालने को था अथवा वास्तव में मामला उसके हाथ से निकल गया था। विहिप ने कारसेवा को नियंत्रण में रखने के लिए सभी को परिचय पत्र जारी किए थे। 

- प्रत्येक 100 कारसेवकों पर एक टोली नायक तय था। कारसेवा का रिहर्सल भी कराया गया था, जिसमें राम जन्मभूमि स्थल के पास वाले गेट से कारसेवकों को प्रवेश कराकर शेषावतार मंदिर के पास से होते हुए रामकथा कुंज की तरफ से निकलना था, ताकि कुछ गड़बड़ न होने पाए। पर, अयोध्या की गलियों में कारसेवा के नारे के साथ घूम रहे नौजवानों की भाव-भंगिमा कुछ और ही कह रही थी। 

- राजस्थान से आए कारसेवक कह रहे थे कि इस बार भी नाटक हुआ तो वह आरपार करके जाएंगे। खुद को शिवसैनिक बताने वाले एलान करते घूम रहे थे ‘रोका गया तो ढांचा ढहा देंगे।’ कुछ कह रहे थे कि ‘नेता लोग डाले रेता। हमें तो गर्भगृह पर कारसेवा के लिए बुलाया गया है, वही करेंगे।’ राम जन्मभूमि न्यास के कार्यकारी अध्यक्ष रामचंद्र परमहंस से जब इस बारे में सवाल हुआ तो उन्होंने जवाब दिया, ‘कारसेवा कैसी होती है यह आप लोग कल देख लीजिएगा।’ पर, पता नहीं भाजपा और विहिप इसे समझ नहीं पाए या समझने की कोशिश नहीं की।

आडवाणी, जोशी, सिंहल पहुंचे

राम जन्मभूमि परिसर में सुबह 6 बजे से ही भजन-कीर्तन चल रहे थे। विभिन्न प्रांतों से आए कारसेवक अलग-अलग शैली में नृत्य कर रहे थे। रामकथा कुंज में बने मंच पर बैठे साधु-संत भी ताल से ताल मिला रहे थे। जयश्रीराम का नारा चारों तरफ गूंज रहा था। कारसेवकों के गले में परिचय पत्र लटके हुए थे। सब कुछ ठीक तरीके से चल रहा था।

प्रात: 9.30 के लगभग कुछ कारसेवकों ने रेलिंग पार करके अंदर जाने की कोशिश की, पर स्वयंसेवकों ने उन्हें जाने नहीं दिया। सुबह लगभग 10.20 बजे आडवाणी, जोशी पहुंचे, जिन्हें प्रशिक्षित कार्यकर्ता जैसे-तैसे मंच तक लेकर गए। कुछ देर में मंच पर अशोक सिंहल, स्वामी चिन्मयानंद, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा सहित अन्य कई भाजपा नेता तथा तमाम साधु-संत पहुंच गए। विनय कटियार तो पहले से ही मौजूद थे।

शुरू हुआ हंगामा
- प्रमोद महाजन भाषण दे रहे थे। वक्त तकरीबन साढ़े ग्यारह बजे का होगा। अचानक विवादित ढांचे के दक्षिण-पश्चिम कोने से कारसेवकों का एक जत्था संघ के कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों को धकेलते हुए खतरनाक कंटीले तारों की बाड़ तोड़ते हुए विवादित परिसर की तरफ बढ़ा। सुरक्षा बलों ने लाठी चलाकर इन्हें रोकने की कोशिश की तो दूसरी तरफ से भीड़ ने हमला बोल दिया। 

- सुरक्षा बलों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें, क्योंकि कल्याण सरकार ने अधिकारियों को पहले ही हिदायत दे रखी थी कि किसी भी हाल में गोली नहीं चलनी चाहिए। अधिकारी कुछ निर्णय नहीं ले पा रहे थे, इसी बीच कारसेवकों का एक और जत्था विवादित परिसर में घुसने में कामयाब हो गया। सुरक्षा बल अब सिर्फ मूकदर्शक बनकर रह गए थे। 

- तत्कालीन जिलाधिकारी आरएन श्रीवास्तव और एसएसपी डीबी राय स्तब्ध से खड़े थे। आडवाणी और जोशी ने कारसेवकों को समझाने की कोशिश की तो वे उन पर ही उग्र हो गए। जैसे-तैसे ये लोग वहां से निकले, पौने 12 के आसपास कारसेवकों ने ढांचे के पिछले गेट को ढहा दिया। देखते-देखते कारसेवकों ने पूरे परिसर को अपने कब्जे में ले लिया। कुछ लोग गुंबदों पर चढ़ गए। ‘जयश्रीराम’ के नारे गूंज रहे थे और गुंबदों पर चढ़े लोगों के हाथों की गैतियां और बेलचे गुंबदों को तोड़ रहे थे। जो नीचे थे, वे दीवारों को गिराने में जुटे थे। पुलिस और प्रशासन की गाड़ियां घायल होने वाले कारसेवकों को अस्पताल पहुंचाने की भूमिका में आ चुकी थीं।

कारसेवक नहीं माने...

आडवाणी और जोशी के बाद विहिप नेता अशोक सिंहल ने भी माइक पर अपील करने के साथ मौके पर जाकर कारसेवकों को समझाने की कोशिश की, लेकिन किसी की एक नहीं सुनी गई। इसके बाद तो सभी ने खुद को समय पर और कारसेवकों की मर्जी पर जैसे छोड़ दिया।  

-  उमा भारती सहित कुछ भाजपा नेता और संत-धर्माचार्य माइक संभाले अब कारसेवकों की लय में बोल रहे थे। लगभग 12.30 बजे तक यह खबर न सिर्फ फैजाबाद और अयोध्या की गलियों में, बल्कि देश व दुनिया में भी फैल चुकी थी कि विवादित परिसर में कारसेवकों का कब्जा हो गया है और वे उसे ढहा रहे हैं। घटनास्थल पर अजीबोगरीब स्थिति हो चुकी थी।

किसी कीमत पर गोली   नहीं चलनी चाहिए
- 6 दिसंबर को किसी असंभावित घटना से निपटने के लिए अयोध्या एवं फैजाबाद के निकट केंद्रीय सुरक्षा बलों (सीआरपीएफ) और रैपिड एक्शन फोर्स की टुकड़ियां पड़ाव डाले थीं, पर इस घटना की सूचना पर जैसे ही ये टुकड़ियां विवादित स्थल की ओर बढ़ीं तो अयोध्या और फैजाबाद के नागरिक सड़कों पर निकल आए। स्थानीय अधिकारियों ने जिलाधिकारी को बताया कि लोगों ने रास्ते अवरुद्ध कर दिए हैं। लोग सुरक्षा बलों को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। बल प्रयोग पर आम लोगों की जान-माल को काफी नुकसान हो सकता है।

-  बताया जाता है कि मुख्यमंत्री कल्याण को दोपहर 12 बजे सूचना मिली कि विवादित ढांचे को कारसेवक तोड़ रहे हैं। उन्होंने फैजाबाद के जिला प्रशासन को कारसेवकों को ढांचे से हटाने को कहा। प्रशासन की बल प्रयोग की मांग पर उन्होंने कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बलों का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन किसी कीमत पर गोली नहीं चलनी चाहिए। 

- दस्तावेजों से पता चलता है कि अपराह्न तत्कालीन मुख्य सचिव ने फैजाबाद जिला प्रशासन का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री से बल प्रयोग के फिर निर्देश मांगे। कल्याण सिंह ने लिखा, अयोध्या में परिस्थितियां जिस बिंदु पर पहुंच गई हैं, उसे देखते हुए गोली चलाने से भारी हिंसा की संभावना है। इसकी लपटें पूरे देश को चपेट में ले सकती हैं जो और दुर्भाग्यपूर्ण होगा। अत: गोली न चलाई जाए। गोली चलाने के अलावा सारे उपाय किए जाएं।
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अस्थायी मंदिर का निर्माण

इस घटना की तस्वीर खींचने की कोशिश करने पर पत्रकार और फोटोग्राफर भी कारसेवकों का निशाना बने। दोपहर लगभग 1.30 बजे कारसेवकों ने दीवार गिरा दी। लोग ढांचे से गिर रहे ईंट के टुकड़ों को अपने साथ ले जाने लगे। इनमें सुरक्षाबलों के लोग भी थे। रामकथा कुंज में मंच पर मौजूद आचार्य धर्मेंद्र कारसेवकों से अपील कर रहे थे कि जिन्होंने प्रसाद नहीं लिया है, वे भी प्रसाद लेकर जाएं। वह ढांचे के टुकड़ों को प्रसाद कह रहे थे। 

- करीब 2.40 बजे पहला गुंबद गिरा, जिसमें कुछ कारसेवक दबकर मर गए। उधर, मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का केंद्रीय गृहमंत्री चह्वाण से लगातार संपर्क बना हुआ था। लगभग पौने चार बजे दूसरा गुंबद जमीन पर आ गिरा। कल्याण को दूसरे गुंबद के गिरने की सूचना मिली। वह पूरी स्थिति समझ गए और इस्तीफा देने का मन बना लिया। उधर, 4.40 बजे मध्य वाला तीसरा गुंबद, जिसे विहिप और संत गर्भगृह मानते थे वह भी गिर गया। मार्गदर्शक मंडल के सदस्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य रामानुजाचार्य ने नारा लगाया, अभी तो ये झांकी है, मथुरा-काशी बाकी है। 

-  उधर, मंच पर उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा एक-दूसरे से लिपटकर खुशी जाहिर कर रही थीं और जय श्रीराम का नारा लगा रही थीं। इस सबके बीच कारसेवक जिस तरह मलबे का एक-एक हिस्सा उठाकर ले जा रहे थे, उससे लग रहा था कि शायद वे वहां ढांचा गिराने का कोई सुबूत नहीं छोड़ना चाहते। विहिप ने एलान किया कि मंदिर निर्माण का दूसरा चरण पूरा हो गया।

विनय कटियार और अशोक सिंहल इस प्रयास में थे कि जब तक अस्थायी मंदिर न बन जाए, तब तक कारसेवकों को यहां बनाए रखा जाए। कटियार ने माइक पर कारसेवकों से परिसर न छोड़ने का आग्रह किया। उधर, कारसेवकों के गुंबदों पर चढ़ने के साथ विहिप और संतों ने संबंधित स्थान से मूर्ति हटा दी थी। 

-  ढांचा ढहने के बाद हालांकि प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग चुका था। कल्याण सरकार ने इस्तीफा दे दिया था, जबकि राव सरकार कह रही थी कि उसने सरकार को बर्खास्त कर दिया है। पूरा तंत्र केंद्र सरकार के अधीन हो गया। अयोध्या और फैजाबाद सहित कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया था। 

- बावजूद इसके, संबंधित स्थल पर जमे कारसेवकों ने गर्भगृह वाली जगह पर भगवा रंग के कपड़े से अस्थायी मंदिर बनाकर उसमे फिर से रामलला को स्थापित कर दिया। वहां तक पहुंचने के लिए 26 सीढ़ियां भी बना लीं। यह सारा काम 6 दिसंबर की रात से लेकर मंगलवार 8 दिसंबर को सुबह करीब 4 बजे तक चला। 
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