राव ने चली चाल
विहिप ने विवादित ढांचे को तोड़े बिना मंदिर का काम इस अविवादित जमीन से शुरू करने की योजना बना रखी थी, ताकि लोग भी संतुष्ट हो जाएं और सरकार भी चलती रहे। पर, राव को इसकी भनक लग गई। राव को शायद लगा कि संघ परिवार की रणनीति कामयाब रही तो भाजपा के पक्ष में जबरदस्त माहौल बन जाएगा।
संघ परिवार के एक महत्वपूर्ण पूर्व पदाधिकारी दावे के साथ बताते हैं कि राव ने उस समय मंदिर आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में काम करने वाले एक सज्जन को जो उन दिनों दिल्ली में ही थे, प्रेम से बुलाया। उनसे बातचीत की। राम मंदिर के प्रति अपनी आस्था जताई और कहा कि वे भी दिल से चाहते हैं कि मंदिर बन जाए। पर, यह बनेगा कैसे, क्योंकि मुस्लिम पक्ष विरोध कर रहा है।
न्यायालय से स्थगनादेश
बताते हैं कि मंदिर आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में काम करने वाले व्यक्ति राव की सज्जनता और विनम्रता में फंस गए। उत्साहित होकर पूरी योजना बता बैठे कि अविवादित भूमि के अमुक टुकड़े से काम शुरू होगा। माना जाता है कि राव ने मुस्लिम पक्ष के बीच यह जानकारी पहुंचाई, जिसके बाद मुस्लिम पक्ष ने उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर कर दी।
इस पर अदालत ने मार्च 1992 में सरकार को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे दिया। मामला लटक गया। हालांकि बाद में ढांचा ध्वंस का कारण मंदिर निर्माण में देरी से उफनाया गुस्सा ही बना। इसमें इस मामले को लटकाना प्रमुख वजह थी।