गोंडा के पृथ्वीनाथ धाम का शिवलिंग।
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स्थानीय नगर पंचायत से तीन किलोमीटर पश्चिम स्थित पृथ्वीनाथ शिव मन्दिर है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान भीम ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। यह शिवलिंग प्राचीन काल का माना जाता है। मन्दिर में स्थापित साढ़े पांच फुट ऊंचे शिवलिंग काले-कसौटे दुर्लभ पत्थरों से निर्मित है। 61 फीट लम्बे इस शिवलिंग का शेष हिस्सा भूमि के नीचे है। टीले पर स्थित इस मंदिर के बारें में जानकारों का कहना है कि मुगल काल में उनके एक सेनापति ने पूजा-अर्चना की और मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। उसके बाद यह शिवलिंग धीरे-धीरे जमीन में समां गया।
कालान्तर में खरगूपुर के राजा गुमान सिंह की अनुमति से यहां के निवासी पृथ्वी सिंह ने मकान निर्माण के लिए खोदाई शुरू करायी। उसी रात स्वप्न में पता चला कि नीचे सात खण्डों का शिवलिंग दबा हुआ है। इसके बाद पृथ्वी सिंह ने पूरे टीले की पुनः खोदाई करायी जहां पर एक विशाल शिवलिंग उभरकर सामने आया। उन्होंने इसके बाद हवन के उपरान्त पूजन-अर्चन शुरू कराया तभी से इसका नाम पृथ्वीनाथ मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया और बड़ी संख्या में लोगों की आस्था का केंद्र बन गया।
तीन दशक पूर्व पुरातत्व विभाग ने बताया इतिहास
पृथ्वीनाथ मंदिर के लिए बीते तीन दशक पूर्व तत्कालीन सांसद कुंवर आनन्द सिंह ने प्रयास किया। उनके पत्र पर पुरातत्व विभाग की जांच में पाया गया कि उक्त मन्दिर में स्थित शिवलिंग एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है, जो पांच हजार वर्ष पूर्व महाभारत काल का है। लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से दर्शन पूजन व जलाभिषेक करने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
मान्यता - पूजन से पूरी होती है अभिलाषा
पृथ्वी नाथ मन्दिर के मुख्य पुजारी जगदम्बा प्रसाद तिवारी ने बताया कि श्रद्धालु जलाभिषेक, पूजन अर्चन, रुदाभिषेक, महामृत्युंजय जप, श्रृंगार पूजा आदि का कार्य करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सावन में मंदिर का अलग ही महत्व है। प्रभारी निरीक्षक कमलाकांत त्रिपाठी ने बताया कि गर्भगृह व मन्दिर परिसर की सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस बल की ड्यूटी लगाई गई है।